संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दुरन्त पापोंका भी नाश करनेवाला है। साधु-सभा (सत्संग) रूपी सूर्यका उदय कोई अद्भुत और अनिर्वचनीय प्रभाव रखता है; क्योंकि वह अन्तःकरणमें व्याप्त हुए अज्ञानान्धकारका अत्यन्त विनाश करने-वाला है। साधु-समागमसे प्रकट हुए आनन्दमय अमृतरसकी सभी लहरें श्रेष्ठ हैं तथा वे सुधा, माध्वी, शर्करा और मधुके समान मीठी एवं छः^१ रसोंसे युक्त हैं।^२
तदनन्तर मार्कण्डेय मुनि और राजा इन्द्रद्युम्न आदि छहों मित्रोंने साधुसंग पाकर शिवशास्त्रके अनुसार क्रियायोग (तप, स्वाध्याय और ईश्वरका ध्यान) आरम्भ किया। एक समय उनके तपस्याकालमें ही लोमश मुनिका दर्शन करनेके लिये उत्सुक हो तीर्थयात्राके प्रसंगसे मैं वहाँ गया, क्योंकि तीर्थयात्राके प्रसंगसे महापुरुषोंके दर्शनके लिये जाना ही यात्राका प्रधान उद्देश्य है। जिस भूभागमें संत-महात्मा निवास करते हैं, वही 'तीर्थ' कहलाता है।^३ अर्जुन! पूजन और आतिथ्य-सत्कार होनेके पश्चात् जब मैं भलीभाँति विश्राम कर चुका, तब उन नाड़ीजंघ आदि भक्तोंने प्रणाम करके मुझसे पूछा—'ब्रह्मन्! मोक्ष-साधनके लिये कौन-सा स्थान है, बतलानेकी कृपा करें?'
उनके ऐसा पूछनेपर मैंने कहा—तुमलोग महासंवर्तसे यह बात पूछो। वे तुम्हें सब तीर्थोंके फलकी प्राप्ति करानेवाले तीर्थस्थानका पता बतायेंगे।
वे बोले—योगी संवर्तजी कहाँ तपस्या करते हैं, यदि जानते हों तो बताइये?
तब मैंने कहा—संवर्त मुनि काशीमें रहते हैं। उन्होंने गुप्त वेष धारण कर रखा है। वे नंगे रहते और भिक्षान्न भोजन करते हैं। दिनके दूसरे पहरकी पिछली घड़ी और तीसरे पहरकी पहली घड़ीको 'कुतप' काल कहते हैं। उसके बाद ही वे निकलते हैं और हाथमें ही भिक्षा लेकर उसे भोजन करते हैं। उनके पास किसी प्रकारकी वस्तुका भी संग्रह नहीं है। वे प्रणववाच्य परब्रह्म परमेश्वरका ध्यान करते रहते हैं। सायंकाल वनमें रहते हैं, किन्तु कोई भी मनुष्य उन योगीश्वर संवर्तजीको पहचान नहीं पाता। न पहचाननेका एक कारण भी है, उन्हींके-जैसे वेष और चिह्न धारण करनेवाले दूसरे लोग भी वहाँ रहते हैं। मैं एक ऐसा लक्षण बतलाता हूँ, जिससे तुमलोग संवर्तजीको पहचान लोगे। रातको उस चौड़ी सड़कपर, जो नगरके मध्यसे होकर निकलती है, तुमलोग एक मुर्दा लाकर जमीनपर इस ढंगसे रखना, जिससे दूसरोंको उसका पता न चले और स्वयं उससे थोड़ी ही दूरपर खड़े रहना। जो कोई भी उस भूमिके निकटतक आकर सहसा लौट पड़े, वही संवर्त हैं। ये मुर्देको शल्य समझकर उसे लाँघकर नहीं जाते; यह एक संशयरहित पहचान है। इस प्रकार जब संवर्तजी मिल जायँ तब विनीत भावसे उनकी शरणमें जाकर उनसे अपनी इच्छाके अनुसार प्रश्न करना। यदि वे पूछें, 'मेरा पता किसने बताया है?' तो मेरा नाम प्रकट कर देना।
मेरी बात सुनकर उन सबने वैसा ही किया।
१- दास्यरति, सख्यरति, वात्सल्यरति, शान्तरति, कान्तरति तथा अद्भुतरति— भक्तिरसके पोषक ये षड्विध भाव ही यहाँ छः रस बताये गये हैं।
२- तीर्थादप्यधिकः स्थाने सतां साधुसमागमः। पचेलिमफलः सद्यो दुरन्तकल्मुषापहः॥
अपूर्वः कोऽपि सद्गोष्ठी सहस्रकिरणोदयः। य एकान्ततयात्यन्तमन्तर्गततमोपहः॥
साधुगोष्ठीसमुद्भूतसुखामृतरसोर्मयः। सर्वे वराः सुधाशीधुशर्करामधुषड्रसाः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ११।६-८)
३- मुख्या पुरुषयात्रा हि तीर्थयात्रानुषङ्गतः। सद्भिः समाश्रितो भूमिभागस्तीर्थतयोच्यते ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ११।११)