संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १२७
तथा मुक्तिके अधीश्वर भी आप ही हैं, आपको नमस्कार है।'
पार्वतीनन्दन स्कन्दने सबको वर देनेवाले शूलपाणि भगवान् उमापतिकी इस प्रकार स्तुति करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और 'नमो नमः' का उच्चारण किया।*
इस प्रकार भक्तिभावसे भरे हुए अपनेयोग्य स्तवन सुनकर शिवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और पुत्र कार्तिकेयका उन्होंने चिरकालतक अभिनन्दन करके कहा—'बेटा! मेरे भक्तके वध करनेका जो दुःख तुम्हारे मनमें हुआ है, उसका विचार तुमको नहीं करना चाहिये। अपने इस कर्मसे तुम मुनियोंके लिये भी स्पृहणीय बन गये हो। जो लोग सायंकाल और सबेरे पूर्ण भक्तिपूर्वक तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मेरा स्तवन करेंगे, उनको जो फल प्राप्त होगा, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो—उन्हें कोई रोग नहीं होगा, दरिद्रता भी नहीं होगी तथा प्रियजनोंसे कभी वियोग भी न होगा। वे इस संसारमें दुर्लभ भोगोंका उपभोग करके मेरे परम धामको प्राप्त होंगे। इतना ही नहीं, मैं उन्हें और भी परम दुर्लभ वर प्रदान करूँगा। बेटा! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ और तुम्हारी प्रसन्नताके लिये सब कुछ करूँगा। जो मनुष्य वैशाखमासकी पूर्णिमाको महीसागरके तटपर मेरी स्तुति करेंगे, उनका वह सब दान, पूजन अक्षय होगा। जो मानव वैशाखकी पूर्णिमाको यहाँके सरोवरमें स्नान करेंगे, उन्हें सब तीर्थोंके स्नानजनित फलकी प्राप्ति होगी। कार्तिकेय! जब कभी अनावृष्टि हो, नाना प्रकारके उत्तम कलशोंद्वारा विधिपूर्वक गन्धयुक्त जलसे मुझे एक, तीन, पाँच अथवा सात राततक स्नान करावे और मेरे सर्वांगमें कुंकुमका लेप करे, फिर दो वस्त्र धारण कराकर लाल कनेरके पुष्पोंसे तथा जवाके पुष्पोंसे और फूलकी मालाओंसे मेरा पूजन करे। पूजनके पश्चात् उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी ब्राह्मणोंको भोजन करावे। मेरी प्रसन्नताके लिये एक लाख आहुति हवन करे, ग्रहादिकी शान्तिके लिये भी हवन करे। तदनन्तर भूमिदान करके गौके लिये दैनिक ग्रास (अथवा एक दिनके खानेके लिये पर्याप्त चारा, दाना आदि) दे। तत्पश्चात् मंगलमय शान्तिपाठ एवं रुद्रका जप करावे। इसी विधानसे उत्तम ब्राह्मणोंद्वारा अनुष्ठान करानेपर जल-शून्य बादल भी उस समय अवश्य वर्षा करते हैं। भाँति-भाँतिके धान्यों तथा हरी-हरी घासोंसे वसुधा परिपूर्ण हो जाती है। मनुष्यों और पशुओंमें कोई रोग नहीं रह जाता। इस अनुष्ठानके प्रभावसे राजा धर्मपरायण होता है। शत्रुमण्डलीसे वह कभी पीड़ित नहीं होता। जो मनुष्य यहाँ भक्तियुक्त होकर मुझे घृतसे स्नान कराता है, उसे कन्यादानका फल होता है। जो दूध अथवा पंचामृतसे मुझे स्नान कराता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो कुमारेश्वर तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होता है,
* नमः शिवायास्तु निरामयाय नमः शिवायास्तु मनोमयाय । नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय ॥
नमो भवायास्तु भवोद्भवाय नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय । नमोऽस्तु ते गूढमहाव्रताय नमोऽस्तु मायागहनाश्रयाय ॥
नमोऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय । नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय ॥
नमो निसर्गात्मकभूतिकाय नमोऽस्त्वमेयोक्षमहर्द्धिकाय । नमः शरण्याय नमोऽगुणाय नमोऽस्तु ते भीमगुणानुगाय ॥
नमोऽस्तु नाना भुवनाधिकर्त्रे नमोऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे । नमोऽस्तु कर्मप्रसवाय धात्रे नमः सदा ते भगवन्सुकर्त्रे ॥
अनन्तरूपाय सदैव तुभ्यमसहा्रकोपाय सदैव तुभ्यम् । अमेयमानाय नमोऽस्तु तुभ्यं वृषेन्द्रयानाय नमोऽस्तु तुभ्यम् ॥
नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोऽस्तु ते व्याधिगणापहाय । चराचरायाथ विचारदाय कुमारनाथाय नमः शिवाय ॥
ममेश भूतेश महेश्वरोऽसि कामेश वागीश बलेश धीश । क्रोधेश मोहेश परापरेश नमोऽस्तु मोक्षेश गुहाशयेश ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २७। ४०—४७)