संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १७५ |
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सांसारिक सम्पूर्ण दोषोंसे द्वेष नहीं करता, तथापि कोई भी दोष मुझमें प्रकट नहीं होता! जैसे कमलके पत्तेपर जलकी बूँदका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरा स्वभाव राग-द्वेष आदिसे लिप्त नहीं होता। मैं नित्य हूँ, बहुतोंके स्वभावोंका साक्षी हूँ, अनित्य भोग मुझपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। जैसे सूर्यकी किरणें आकाशमें लिप्त नहीं होतीं, वैसे ही मेरे भगवदर्थ किये गये निष्काम कर्मोंमें भोगसमूह नहीं लिप्त होते (मेरे कर्मोंका फल भोग-सामग्रीके रूपमें नहीं उपस्थित होता, वे कर्म तो भगवत्प्राप्ति करानेवाले होते हैं), माता! ऐसे मुझ पुत्रसे तुम दुःखी न होओ। मैं तुम्हें उस पदपर पहुँचाऊँगा, जहाँ सैकड़ों यज्ञ करके भी पहुँचना असम्भव है।'
अपने पुत्रकी यह बात सुनकर इतराको बड़ा विस्मय हुआ। वह सोचने लगी, 'अहो! यदि मेरा पुत्र ऐसा दृढ़निष्ठावाला विद्वान् है, तब तो संसारमें जब इसकी ख्याति होगी, उस समय मेरा भी महान् यश फैलेगा।' माता इस प्रकारकी बातें सोच ही रही थी कि शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णु उस अर्चा-विग्रहसे साक्षात् प्रकट हो गये। वे उस द्विजपुत्रकी बातोंसे अत्यन्त प्रसन्न थे। भगवान्की दिव्य कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान थी। वे अपनी प्रभासे सम्पूर्ण जगत्को उद्भासित कर रहे थे। भगवान्को देखते ही ऐतरेय धरतीपर दण्डकी भाँति पड़ गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहने लगे। वाणी गद्गद हो गयी। बुद्धिमान् ऐतरेयने मस्तकपर अंजलि बाँधकर भगवान्का इस प्रकार स्तवन प्रारम्भ किया—
"आप भगवान् वासुदेवका हम ध्यान और नमस्कार करते हैं। आप ही प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण हैं, आपको नमस्कार है। आप केवल विज्ञानस्वरूप तथा परमानन्दमूर्ति हैं, आपको नमस्कार है। आप आत्माराम, शान्त तथा आप समस्त इन्द्रियोंके स्वामी (हृषीकेश) हैं, सबसे महान् तथा अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न हैं; आपको नमस्कार है। मनसहित वाणीके थककर निवृत्त हो जानेपर जो एकमात्र अपनी कृपासे ही सुलभ होनेवाले हैं, नाम और रूपसे रहित चैतन्यघन ही जिनका स्वरूप है, वे सत् और असत्से परे विराजमान परमात्मा हम सबकी रक्षा करें। आप परम सत्य तथा निर्मल हैं, हम आपकी उपासना करते हैं। जो षड्विध ऐश्वर्यसे युक्त परम पुरुष महानुभाव एवं समस्त महाविभूतियोंके अधिपति हैं, उन भगवान्को नमस्कार है। परमेष्ठिन्! आप सबसे उत्कृष्ट हैं, सम्पूर्ण भक्तसमुदाय आपके युगल चरणारविन्दोंकी बड़े लाड़-प्यारसे सेवा करते हैं। आपको नमस्कार है। अग्नि आपका मुख है, पृथ्वी आपके दोनों चरण हैं, आकाश मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, सम्पूर्ण लोक आपका शरीर है तथा चारों दिशाएँ आपकी चार भुजाएँ हैं। भगवन्! आपको नमस्कार है। हे स्तुति करनेयोग्य परमात्मन्! हे नाथ! इस पृथ्वीपर कोई भी ऐसे प्रदेश नहीं हैं, जिनमें मेरा जन्म न हुआ हो, जहाँ मेरी मृत्यु न हुई हो। मैं समझता हूँ, यदि मेरे माता-पिताओंकी गणना की जाय, तो यह विशाल पृथ्वी परमाणुओंकी स्थितिमें पहुँच जायगी—असंख्य जन्मोंके मेरे माता-पिताओंकी गणना करनेके लिये पृथ्वीके परमाणु बराबर टुकड़े करने पड़ेंगे। देवदेव! मेरे जो मित्र, शत्रु, अनुजीवी तथा भाई-बन्धु इस संसारमें हो गये हैं, उन सबकी गणना करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। नाथ! मैंने अपना मन बार-बार आपके चरणोंमें समर्पित किया, परंतु मेरा दुर्जय शत्रु काम अपने क्रोध आदि सहायकोंके द्वारा उसे हठात् अपने वशमें कर लेता है। भगवन्! अब आप ही बताइये, ऐसी दशामें मैं क्या करूँ? सर्वव्यापी परमेश्वर! मैं बहुत ही पीड़ित हूँ। संसाररूपी गड्ढेमें गिरे हुए इस दीनपर आप दया कीजिये। दुर्गतिमें पड़ा