संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहात्म्य-खण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * | २५७ ---|---
न करना। अरुणाचलकी परिक्रमा करनेसे तुम्हारे इस शापका निवारण होगा। अरुणाचल साक्षात् भगवान् शिवके स्वरूप हैं। प्राचीन कालमें इन्द्र, उपेन्द्र और यम आदि दिक्पालोंने सैकड़ों वर्षोंतक इनकी उपासना की थी। उसी समय नन्दनवनके देवता इन्द्रने देवाधिदेव महादेवजीको एक लाल रंगका अद्भुत फल भेंट किया। वह मनको लुभा लेनेवाला था। उसे देखकर गणेश और कार्तिकेय दोनों भाई अपने बालक-स्वभावके कारण कौतूहलवश उसकी ओर आकृष्ट हो गये और अपने पिता भगवान् शंकरसे वह फल माँगने लगे। तब भगवान् शिवने वह फल अपनी मुट्ठीमें छिपा लिया और उसकी अभिलाषा रखनेवाले दोनों कुमारोंसे इस प्रकार कहा, 'पुत्रो! तुम दोनोंमेंसे जो भी लोकालोक पर्वतसे घिरी हुई इस समूची पृथ्वीकी परिक्रमा करनेमें समर्थ हो उसे ही यह फल दूँगा।' पार्वतीवल्लभ शिवने जब मुसकराते हुए मुखचन्द्रसे ऐसी बात कही, तब कार्तिकेयजीने समस्त पृथ्वीकी परिक्रमा आरम्भ कर दी। परंतु गणेशजी अरुणाचलरूपी पिता महादेवजीकी ही परिक्रमा करके तत्काल उनके सामने खड़े हो गये। उनकी यह चतुराई देखकर भगवान् शिवने स्नेहसे उनका मस्तक सूँघकर उन्हींको वह फल दे दिया और यह वरदान दिया कि 'आजसे तुम सभी फलोंके अधिपति हो जाओ।' एक दाँतवाले गणेशजीको ऐसा वर देकर भगवान् शंकरने वहाँ आये हुए समस्त देवताओं और असुरोंसे कहा—'यह अरुणाचल मेरा स्थावर विग्रह है। जो इसकी परिक्रमा करता है, वह समस्त ऐश्वर्योंका भागी होता है। जो पुरुष इस पर्वतको अपने दाहिने रखकर इसके चारों ओर चक्कर लगाता है वह चक्रवर्ती राजा होकर अन्तमें सर्वोत्कृष्ट सनातन पदको प्राप्त कर लेता है।' महादेवजीकी इस आज्ञासे सब देवताओंने अरुणाचलकी परिक्रमा करके अपना-अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त किया। अतः तुम दोनों भी जब अरुणाचलकी प्रदक्षिणा कर लोगे, तब उससे तुम्हारे शापका अन्त हो जायगा। पशुयोनिमें रहनेपर भी पाण्ड्यनरेश वज्रांगदके सम्बन्धसे तुम दोनोंके द्वारा अरुणाचलकी परिक्रमा सम्पन्न होगी और वह सफल भी हो जायगी।'
कलाधरने कहा—नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मेरा मित्र कान्तिशाली काम्बोजदेशमें घोड़ा हुआ और आपकी सवारीमें आया। मैं भी कस्तूरी-मृग होकर अपने ही शरीरसे उत्पन्न सुगन्धके मदसे उन्मत्त हो इस अरुणाचलपर विचरने लगा। धर्मात्मन्! आपने मृगयाके बहाने इस समय यहाँ आकर हम दोनोंसे अरुणाचलनाथकी परिक्रमा करवा दी। आपने सवारीपर चढ़कर यह परिक्रमा की है। इस दोषसे आपकी ऐसी शोचनीय दशा हो गयी है। हम दोनोंने पैदल चलनेके पुण्यसे अपने पूर्वपदको प्राप्त किया। महाराज! आपके ही सम्बन्धसे हम इस पशुयोनिके बन्धनसे छूटकर अपने धामको प्राप्त हुए हैं; इसलिये आपका सदा ही कल्याण हो।
यों कहकर कलाधर अपने मित्र कान्तिशालीके साथ जब अपने धामको जाने लगा, तब राजाने हाथ जोड़कर कहा—'आप दोनों तो अरुणाचलरूपी भगवान् शंकरके प्रभावसे शापरूपी समुद्रके पार हो पुनः अपने पदको प्राप्त हो गये, परंतु मेरा चित्त भ्रान्त-सा हो रहा है। मेरे नेत्र अन्धे-से हो गये हैं और ऐसा जान पड़ता है मानो मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। अतः ऐसा होनेमें दैवबलका ही उत्कर्ष सूचित होता है।'
कलाधरने कहा—राजन्! मैं तुमसे तुम्हारे हितके लिये भी जो कहता हूँ उसे निश्चिन्त तथा एकाग्रचित्त होकर सुनो। संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भगवान् महेश्वरके स्वरूपभूत अरुणाचलनाथ करुणाके सागर हैं। तुम इन्हींमें अपना मन लगाओ (इनकी महिमा तो तुमने इस समय अपनी आँखों देखी जो कि पशुयोनिमें पड़े हुए हम दोनोंको इन्होंने ऐसे दिव्य पदकी प्राप्ति करा दी)। तुम भी पैदल होकर भगवान् अरुणाचलकी परिक्रमा करो। इन्हें कस्तूरीकी