भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 288
  • माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २५९

सेवा करनेसे सन्तुष्ट होकर अरुणाचलनाथने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे हिमालयके समान श्वेत वृषभराजकी पीठपर चढ़कर अपने पीछे बैठी हुई पार्वतीदेवीसे सटे हुए थे। वसिष्ठ आदि ब्रह्मर्षि, नारद आदि महर्षि तथा निकुम्भ, कुम्भ आदि गण उनकी जय-जयकार एवं स्तुति कर रहे थे। कमलके समान विकसित एवं विशाल नेत्रोंके कटाक्षपात मानो करुणासिन्धुकी उठती हुई तरंग थे और उनके द्वारा भगवान् शिव सम्पूर्ण जगत्की मलिनताका निवारण-सा कर रहे थे। इस प्रकार देवाधिदेव महादेवको उपस्थित देखकर महाराज वज्रांगदको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने भगवान्‌को साष्टांग प्रणाम किया और मस्तकपर अंजलि बाँधकर कहा—'देवेश ! मैंने जो मोहवश आपके समीप सवारीपर बैठकर विचरण किया है, उस मेरे एकमात्र अपराधको आप क्षमा करें।'

इस प्रकार अत्यन्त दीन भावसे बोलनेवाले राजासे करुणानिधान जगदीश्वर भगवान् अरुणाचलेश्वरने कहा—वत्स! भय न करो, तुम्हारा कल्याण हो। मेरी आठ मूर्तियाँ हैं। वे सब सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये कल्पित हुई हैं। पूर्वकालमें तुम इन्द्र थे और अहंकारवश तुमने कैलाशशिखरपर बैठे हुए मेरा अपमान किया। तब मैंने उसी समय तुम्हें स्तम्भित करके जडवत् बना दिया। तुम्हारा सारा अभिमान और पापभार क्षणभरमें गल गया और तुम लज्जित होकर मेरे समीप बैठ गये। उस समय मैंने तुम्हें समस्त ऐश्वर्योंके कारणभूत शिव-ज्ञानका उपदेश किया और यह आज्ञा दी कि तुम पृथ्वीपर जन्म ले राजा वज्रांगद होकर मेरी कृपा प्राप्त करोगे। इस समय तुम्हारी की हुई दिन-रातकी सेवाओंसे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हें यह ज्ञान देता हूँ, सुनो। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और पुरुष—इन मेरी आठ मूर्तियोंसे व्याप्त होकर सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रकाशित होता है। मैं इन सब तत्त्वोंसे परे शिव हूँ, मुझसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है। मेरे स्वरूपभूत चिदानन्द-समुद्रसे उठी हुई कुछ लहरें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंको आनन्दसे परिपूर्ण करती हैं। मैं समस्त संसारका स्वामी हूँ। यह गौरीदेवी मेरी महाशक्ति माया हैं। इन्हींके द्वारा सम्पूर्ण विश्व सदा आच्छादित होता और विस्तारको प्राप्त होता है। इन महाशक्तिके द्वारा सदा सृष्टि-रक्षा और संहाररूप लीलाविलासोंसे अत्यन्त विचित्ररूपमें प्रस्तुत किये हुए इस जगत्‌को मैं स्वेच्छासे देखता रहता हूँ। तुम अपने-आपको मेरी महिमासे उसी प्रकार अभिन्न देखो जैसे समुद्रकी तरंग उससे भिन्न नहीं होती। ऐसी दृष्टि हो जानेपर यह सारी पृथ्वी तुम्हें मेरे ही रूपसे सुशोभित दिखायी देगी और उसपर मेरी कृपासे प्रभुत्व प्राप्त करके तुम उत्तम भोगोंका सुखसे उपभोग करोगे। इसके बाद तुम्हें पुनः इन्द्ररूपसे दिव्य सुखदायी भोग दीर्घकालके लिये प्राप्त होंगे। तदनन्तर तुम मुझसे एकरूपता एवं विशुद्ध चिन्मयता प्राप्त कर लोगे।

यों कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये और पुण्यात्मा राजा वज्रांगदने भगवान् अरुणाचलनाथकी आराधना करते हुए ही समस्त भोगोंको प्राप्त किया। 'मुने! इस प्रकार तुमसे शिवभक्तकी उन्नतिका वृत्तान्त, अरुणाचलकी प्रदक्षिणाका फल तथा सदाचारका अक्षय परिणाम बताया गया। अरुणाचलसे बढ़कर दूसरा क्षेत्र नहीं है। अरुणाचलेश्वरसे बढ़कर और कोई देवता नहीं है तथा उनकी परिक्रमासे अधिक तीनों लोकोंमें दूसरा कोई तप नहीं है।' नन्दिकेश्वरके ऐसा कहनेपर मार्कण्डेयजीके सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांच हो आया। वे बार-बार नेत्रोंसे आनन्दाश्रुकी वर्षा करते हुए अमृतके महासागरमें निमग्न हो गये।

अरुणाचल-माहात्म्यखण्ड सम्पूर्ण

माहेश्वरखण्ड समाप्त