संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २७३
इसे देवाधिदेव शार्ङ्गधनुषधारी परमात्मा विष्णुको समर्पित करें। यह शोभामय वसन्त-ऋतु है। इसमें इस शुभ कार्यका अनुष्ठान शीघ्र कर डालना चाहिये। बृहस्पतिजीको बुलाकर आप विवाहके लिये लग्न निश्चित करें।'
तदनन्तर 'बहुत अच्छा' कहकर आकाशराजने देवलोकसे बृहस्पतिजीको बुलाया और वर-कन्याके विवाहके लिये लग्न पूछा—'ब्रह्मन्! कन्याका जन्मनक्षत्र मृगशिरा है और वरका श्रवण। अतः इन दोनोंके विवाह-सम्बन्धका विचार कीजिये।' तब बृहस्पतिजीने कहा—'वर और कन्या दोनोंके सुखकी वृद्धिके लिये ज्योतिषियोंने उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रको सर्वश्रेष्ठ माना है। अतः वैशाखमासके उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें दोनोंका विधिपूर्वक विवाहकार्य सम्पन्न किया जाय।' यह सुनकर राजाने बृहस्पतिजीकी पूजा करके उन्हें विदा किया और भगवान्की दूतीसे कहा—'शुभे! तुम भगवान्के निवासस्थानको जाओ और देवाधिदेव नारायणसे कहो—वैशाखमासमें यह मंगलकार्य सम्पन्न होगा। आप वैवाहिक मंगलाचार सम्पन्न करके यहाँ पधारें।'
इसके बाद देवीका प्रिय करनेवाले शुकरूपी दूतको वकुलमालिकाके साथ भेजकर आकाशराजने अपने पुत्रको वायु, इन्द्र आदि देवताओंके बुलानेके कार्यमें नियुक्त किया। साथ ही विश्वकर्माको बुलाकर अपने नगरकी सजावटके काममें लगाया। विश्वकर्माने पलभरमें अपना कार्य पूर्ण कर दिया। उधर वकुलमालिका अश्वपर सवार हो शुकके साथ प्रस्थित हुई और वेंकटाचलपर पहुँचकर देवालयके समीप घोड़ेसे नीचे उतरी। फिर शुकको अपने साथ ले मन्दिरके भीतर गयी। वहाँ सुन्दर नेत्रोंवाले भगवान् नारायणको लक्ष्मीजीके साथ रत्नसिंहासनपर विराजमान देख प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोली—'प्रभो! वहाँका कार्य तो मैंने पूरा कर लिया, उधरसे मांगलिक वार्ता करनेके लिये यह शुक आया हुआ है।'
तब भगवान्की आज्ञा पाकर शुकने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'माधव! भूमिकन्या पद्मावतीने आपके पास यह सन्देश भेजा है कि मुझे अंगीकार कीजिये। रमापते! मैं आपके ही नाम लेती हूँ, आपके ही स्वरूपका सदा स्मरण करती हूँ। मधुसूदन! आपकी प्रसन्नताके लिये ही मैं सब कार्य करती हूँ। मेरे इस काममें पिता और माताकी भी सम्मति है। देवेश! मुझपर कृपा करके मुझे अंगीकार कीजिये।'
शुकका यह प्रिय वचन सुनकर श्रीहरिने कहा—'शुक! जाओ और पद्मालयासे इस प्रकार कहो—'देवि! श्रीनारायणदेवने कहा है कि मैं देवताओंको साथ लेकर मंगलमय विवाहकार्य सम्पन्न करनेके लिये अवश्य आऊँगा।' भगवान्का यह वचन सुनकर और प्रसादरूपसे उनकी दी हुई वनमाला लेकर शुक शीघ्र ही आकाशराजकी कन्याके पास लौट गया। उसने कस्तूरीकी सुगन्धसे युक्त वह तुलसीमाला राजकुमारीको देकर प्रणाम किया और भगवान्का शुभ सन्देश कह सुनाया। सुनकर उस प्रसादमालाको हाथमें ले पद्मालयाने उसे मस्तकपर चढ़ा लिया और भगवान्के आगमनकी प्रतीक्षा करती हुई योग्य आभूषण धारण किये। आकाशराजने भी आनन्दमग्न हो चन्द्रदेवको बुलाकर आदरपूर्वक कहा—'राजन्! आप नाना प्रकारका सरस भोजन तैयार कीजिये जो भगवान् विष्णुके भोगमें आने योग्य हो। उत्तम-से-उत्तम अन्नकी व्यवस्था होनी चाहिये।' इस प्रकार प्रबन्ध करके भगवान्के आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए आकाशराज प्रसन्न मनसे राजसभामें बैठे थे।
तदनन्तर देवाधिदेव भगवान् नारायणने भी लक्ष्मीजीको बुलाकर कहा—'कल्याणि! अपनी सखियोंको आज्ञा दो और वैवाहिक कार्य सम्पन्न करो।' भगवान्का यह आदेश सुनकर लक्ष्मीदेवीने सखियोंको बुलाया और सबको आवश्यक कार्य करनेकी आज्ञा दी। लक्ष्मीकी आज्ञासे प्रीतिदेवीने