संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३०७
पुराणोंके अर्थोंने एकीभूत होकर मुनिका शरीर धारण कर लिया हो। वे दिव्य ज्ञानके शुभ आश्रय थे। धृति, क्षान्ति, दया, तुष्टि और शान्ति आदि सद्गुण नित्य उनकी सेवामें रहते थे। वे अखण्ड ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान हो रहे थे। अर्जुनने धीरे-धीरे निकट जाकर मुनिके चरणारविन्दोंके आगे पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया।
अपने आश्रमपर आये हुए कुन्तीनन्दन अर्जुनको मुनिने स्वयं उठाकर अभ्युदयका आशीर्वाद दिया। उस समय उनका चित्त हर्षोल्लाससे परिपूर्ण था। यथायोग्य अर्घ्य आदि प्रस्तुत करके मुनिने अपने प्रिय अतिथिका सत्कार किया और एक आसनकी ओर संकेत करके उन्हें उसपर बिठाया। जब वे बैठ गये तब उनसे स्वास्थ्यसम्बन्धी कुशल-प्रश्न किया। तदनन्तर अर्जुन भोजन करके तपोनिधि भरद्वाज मुनिके समीप ही बैठे और कथा सुननेके कौतूहलसे दिनका शेष भाग वहीं व्यतीत किया। तत्पश्चात् सायं-सन्ध्या करके अग्निमें आहुति दे अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंसहित वे मुनिके कुटीगृहमें गये और वहाँ उनके आशीर्वादसे आनन्दित होकर बैठे। उस समय सुवर्णमुखरी नदीके शीतल जलको छूकर चलनेवाली ठंडी वायुसे अर्जुनको बड़ा हर्ष प्राप्त हो रहा था।
सूतजी कहते हैं—अर्जुनने सुखपूर्वक बैठे हुए भरद्वाज मुनिको प्रणाम करके विनयपूर्वक यह गम्भीर वचन कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इस संसारमें एकमात्र मैं ही धन्य हूँ, जिसका आपने अपने पुत्रके समान भलीभाँति आदर किया है। भगवन्! यह महानदी किस पर्वतसे प्रकट हुई है और कौन इसे ले आया है? तथा इसमें स्नान, दान आदि करनेसे कौन सा पुण्य प्राप्त होता है?'
भरद्वाजजीने कहा—महाबाहु अर्जुन! तुम कौरवकुलको पवित्र करनेवाले हो और धर्मपुत्र युधिष्ठिरके छोटे भाई हो। मैंने अनेक राजा देखे हैं। परंतु वे तुम्हारे समान लीलायुक्त, सरलता, दया, उदारता, धीरता और गम्भीरता आदि गुणोंसे सुशोभित नहीं थे। कुल, विद्या और धन—ये बलवान् पुरुषोंके अभिमानमें कारण होते हैं। परंतु तुम्हारे-जैसे कल्याणमय पुरुषोंके लिये वे भी नम्रता लानेमें कारण हुए हैं। राजन्! मैंने मुनियोंके मुखसे जो दिव्य कथा सुनी है, वह तुमसे कहता हूँ, उसे सुनो। पूर्वकालकी बात है, दक्षकुमारी सती अपने पितासे अपमानित हो शरीर त्यागकर हिमालयकी पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुईं। फिर सप्तर्षियोंने आकर जब प्रार्थना की, तब गिरिराज हिमालय विवाहके समय अपनी पुत्री भगवान् शंकरको देनेको उद्यत हुए। उसके बाद जगदीश्वर शिव पार्वतीको ब्याह लानेके लिये हिमालयके निवासस्थानपर गये। उस समय स्थावर-जंगम सभी प्राणी भगवान् शिवके मंगलमय विवाहका अभिनन्दन करनेके लिये वहाँ उपस्थित हुए। उन सबके भारी भारसे उत्तरकी भूमि नीची हो गयी और दक्षिणकी भूमि भार न होनेसे अत्यन्त हलकेपनके कारण ऊँची हो गयी। इससे सबको बड़ा भय हुआ। तब महादेवजीने अगस्त्यजीके समीप जाकर कहा, 'मुने! यह पृथ्वी अधिक भारसे दबकर विकृतावस्थाको प्राप्त हो गयी है, तुम्हीं इसको बराबर करनेमें समर्थ हो। अतः मेरे कहनेसे इस पृथ्वीको बराबर करो।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् शिवको प्रणाम करके अगस्त्यजी दक्षिण दिशामें चले गये। विन्ध्यगिरिको लाँघकर अगस्त्यके दक्षिण दिशामें जाते ही पृथ्वी समभावको प्राप्त हो गयी।
तदनन्तर अगस्त्यजीने आगे जाकर किसी ऊँचे पर्वतको देखा, जो अपनी फैली हुई घाटियोंसे पृथ्वीको धारण करके स्थित था। वे धीरे-धीरे उस पर्वतपर चढ़ गये और उसके मनोहर शिखरकी सुरम्य स्थलीमें उन्होंने रहनेका विचार किया। वहाँ अमृतके समान जलसे भरा हुआ एक सरोवर था, जिसमें पद्म और उत्पल आदि फूलोंकी शोभा फैली हुई थी। उसके चारों ओर बहुत-से वृक्ष