भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बीचमें ब्रह्मशिला विराजमान है और अगस्त्यजीकी तपस्याके प्रभावसे जहाँ गयातीर्थका वास है। उन दोनों नदियोंके पवित्र संगममें स्नान करनेवाले मनुष्य सौ पुण्डरीक यज्ञोंका फल प्राप्त करते हैं और उनके ब्रह्महत्या आदि समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर महानदी सुवर्णमुखरीके उत्तर भागमें आधे योजन दूर सुप्रसिद्ध वेंकटाचल पर्वत विराजमान है, जिसकी ऊँचाई एक योजनकी है। भगवान् मधुसूदनने पहले वाराह शरीरसे इस पर्वतको अपने रहनेके लिये स्वीकार किया था, इसलिये श्रेष्ठ पुरुषोंने इसे वाराहक्षेत्र कहा है। वेंकटाचलपर भगवान् विष्णु श्रीलक्ष्मीजीके साथ सदैव निवास करते हैं। जो लोग वेंकटाचलनिवासी जगदीश्वर विष्णुका स्मरण करते हैं, वे सब दोषोंसे रहित हो सनातन अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं।

अर्जुनने पूछा— महामुने! लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु परम पवित्र वेंकटाचलपर कैसे प्रकट हुए? किस पुण्यात्मापर प्रसन्न होकर उन्होंने भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले अपने अद्भुत रूपको प्रकाशित किया है?

भरद्वाजजी बोले— कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें भागीरथीके तटपर यज्ञदीक्षापरायण तथा विशुद्ध ज्ञानसे विभूषित महात्मा राजा जनकसे वामदेवजीने जो पापनाशक कथा कही थी, वह भगवान् विष्णुके कीर्तनसे युक्त होनेके कारण सबको पवित्र करनेवाली है। वही कथा अब मैं तुम्हें सुनाऊँगा। भगवान् नारायण ही समस्त प्राणियोंके आदिकारण हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका रूप है, वे जगत्के स्रष्टा हैं, उनका स्वरूप चिन्मय तथा निरंजन है। उनके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। उन्हींके तेजसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। उनसे बढ़कर तेज, उनसे बड़ा तप, उनसे बड़ा ज्ञान, उनसे बड़ा योग तथा उनसे बड़ी विद्या भी नहीं है। वे भगवान् श्रीहरि सदा समस्त प्राणियोंमें विद्यमान हैं। समस्त जीव उन्हींमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। वे ही यज्ञ, यजमान और यज्ञके स्रुक्-स्रुवा आदि साधन हैं। वे ही फल हैं, वे ही फलदाता हैं और वे ही सबके प्राप्त करनेयोग्य परमगति हैं। हरि, सदाशिव, ब्रह्मा, महेन्द्र, परम तथा स्वराट् आदि सभी नाम उन सर्वेश्वर विष्णुके ही पर्याय कहे गये हैं। जो एकाग्रचित्त होकर परमात्मा नारायणके इस माहात्म्यका अनुसन्धान करता है, वह पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता। भगवान् विष्णु चिदानन्दस्वरूप, सबके साक्षी, निर्गुण, उपाधिशून्य तथा नित्य होते हुए भी स्वेच्छासे भिन्न-भिन्न अवस्थाओंको अंगीकार करते हैं। वे पवित्रोंमें परम पवित्र हैं, निराश्रितोंकी परम गति हैं, देवताओंके भी देवता हैं तथा कल्याणमय वस्तुओंमें भी परम कल्याणस्वरूप हैं।* बोध्य पदार्थोंमें एकमात्र वे ही बोध्य हैं। ध्येय तत्त्वोंमें वे ही सर्वोत्तम ध्येय हैं। विनयियोंमें सबसे अधिक विनय और नय भी वे ही हैं। वे सम्पूर्ण तेजोंको उत्पन्न करनेवाले तेज हैं, तपस्याओंमें उच्चकोटिकी तपस्या हैं तथा सब प्राणियोंके परम आधार हैं। जनार्दन भगवान् विष्णुका आदि और अन्त नहीं है। उनके स्वरूपको इदमित्थम् रूपसे जान लेनेमें ब्रह्मा आदि भी मूढ़ हैं। वे अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, सर्वात्मा होकर भी शत्रुओंका वध करते हैं तथा स्वतन्त्र होकर भी अपने भक्तोंके परतन्त्र रहते हैं। सर्वज्ञ भगवान् गरुडध्वज ही कर्मोंकि साक्षी हैं। मुनिलोग एकाग्रचित्त होकर उनके स्वरूपकी खोज करते हैं। भगवान्की चतुर्व्यूह नामसे प्रसिद्ध चार मूर्तियाँ हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध। पहले प्रणवका उच्चारण हो, तत्पश्चात्


* पवित्राणां पवित्रं यो ह्यगतीनां परा गतिः। दैवतं देवतानां च श्रेयसां श्रेय उत्तमम्॥ (स्क० पु०, वै० वे० ३५। ३८)