भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 354
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३२५

कीजिये। महात्मन्! सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि, पालन और संहारकी लीलासे सुशोभित होनेवाला जो आपका त्रिगुणमय (ब्रह्मविष्णु-शिवात्मक) स्वरूप है, वही महत्तत्त्व आदिका भी कारण है। आप प्रकृतिसे परे तथा सबके आदिकारण हैं, आपको नमस्कार है। सर्वव्यापी जगन्नाथ! मेरी रक्षा कीजिये। मैं संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। गोविन्द! अपनी कृपाकटाक्षपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखकर इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये।'

इस प्रकार स्तुति करते हुए ब्रह्मर्षि मार्कण्डेयको कृपादृष्टिसे देखकर भगवान् नारायण इस प्रकार बोले—'विप्रवर! मेरे तत्त्वको न जाननेके कारण ही तुम अत्यन्त दीन हो रहे हो। तुमने अत्यन्त दुष्कर तपका अनुष्ठान किया है, किंतु उससे केवल दीर्घजीवी हुए हो। महामुने! इस कल्पवटके ऊपर पत्तेके दोनेमें सोये हुए उस बालस्वरूपको देखो। वह सबका कालरूप है। उसके फैले हुए मुखमें प्रवेश करके वहाँ सुखपूर्वक रह सकते हो।' भगवान्के ऐसा कहनेपर मार्कण्डेयजीका मुख आश्चर्यसे चकित हो गया। उन्होंने वृक्षपर चढ़कर भगवान्के बालरूपको देखा और उसमें प्रवेश किया। भीतर जानेपर उन्होंने चौदह भुवन देखे। ब्रह्मा आदि देवता, दिक्पाल, सिद्ध, गन्धर्व, राक्षस, ऋषि, मुनि, देवर्षि, समुद्रोंसे चिह्नित भूतल, अनेक तीर्थ, नदी, पर्वत तथा वनोंसे उपलक्षित श्रेष्ठ नगर देखा। सातों पाताल और सहस्रों नागकन्याएँ देखीं। हजारों फणोंसे सुशोभित सम्पूर्ण जगत्का भार धारण करनेवाले शेषनागका दर्शन किया तथा ब्रह्माण्डके मध्यमें ब्रह्माजीने जो कुछ भी सृष्टि की है, वह सब अवलोकन किया। इधर-उधर घूमनेपर भी कहीं उस बालकके उदरका अन्त नहीं मिला, तब पुनः कण्ठमार्गसे बाहर निकलकर उन्होंने मेरे साथ पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका दर्शन किया।

श्रीभगवान् बोले—मुने! यह विचित्र क्षेत्र मेरा सनातन धाम है, ऐसा समझो। यहाँ न सृष्टि है, न प्रलय है और न संसारका बन्धन ही है। सदा एक रूपसे रहनेवाले मुझ मोक्षदायक पुरुषोत्तमको यहाँ विद्यमान जानकर इस क्षेत्रमें प्रवेश करनेवाला पुरुष घनानन्दस्वरूप हो पुनः गर्भमें नहीं आता।

महामुनि मार्कण्डेयने कहा—प्रभो! मैं यहाँ निवास करूँगा। पुरुषोत्तम! मुझपर कृपा कीजिये।

श्रीभगवान्ने कहा—ब्रह्मर्षे! इस मोक्षसाधक क्षेत्रमें मैं प्रलयकी समाप्तिपर्यन्त रहूँगा। प्रलयके अन्तमें तुम्हारे लिये यहाँ सनातन तीर्थका निर्माण करूँगा, जिसके तटपर तपस्या करके मेरे द्वितीय शरीर शिवकी आराधना करते हुए तुम मेरी कृपासे मृत्युको निश्चितरूपसे जीत लोगे।

इस प्रकार पहलेसे वरदान पाये हुए मार्कण्डेय महामुनिने वटके वायव्य कोणमें भगवान्के चक्रसे एक कुण्ड खोदा। उस पवित्र कुण्डमें रहकर भारी तपस्यासे भगवान् महेश्वरकी आराधना करके उन्होंने मृत्युको अनायास ही जीत लिया। उन्हीं मार्कण्डेयजीके नामसे यह कुण्ड प्रसिद्ध है, जिसमें स्नान करके मार्कण्डेश्वर शिवका दर्शन करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। यह पुरुषोत्तमक्षेत्र पाँच कोसतक तो समुद्रके भीतर स्थित है और दो कोसतक उसके तटकी भूमिपर विद्यमान है। यह अत्यन्त निर्मल, सुनहरी बालुकाओंसे व्याप्त तथा नीलगिरिसे सुशोभित है। वे जो विश्वनाथ भगवान् शिव हैं, साक्षात् नारायणस्वरूप ही हैं। वे भगवान् जगन्नाथकी उपासना करनेके लिये समुद्रके तटपर निवास करते हैं। यमराजके दण्डका भय नष्ट करनेके कारण उनका नाम यमेश्वर है। उनका दर्शन और पूजन करनेसे कोटि शिवलिंगोंके दर्शन और पूजनका फल प्राप्त होता है।

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