भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 357

३२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


होकर वे मदिरा पीते और वेश्याके सहवासमें रहकर आनन्दका अनुभव करते थे। परलोककी चिन्ता तो उन्हें कभी स्वप्नमें भी नहीं होती थी। इसी प्रकार मनमाना बर्ताव करते हुए उनकी आधी आयु बीत गयी। एक दिन घूमते हुए वे दोनों यज्ञशालामें जा पहुँचे और दूरसे ही स्तोत्र तथा शास्त्रचर्चा सुनने लगे। वहाँ होनेवाली वैदिक क्रियाओंको देखकर उस समय उन अधार्मिकोंके मनमें भी धर्मके प्रति श्रद्धा हो गयी। उनका नाम पुण्डरीक और अम्बरीष था। वे अपनी उच्च जातिका स्मरण करके अपने दुराचारोंकी निन्दा करते हुए एक-दूसरेसे कहने लगे—'हम दोनों पापके भयंकर समुद्रको कैसे पार करेंगे?' हमने जो-जो पाप संचित किये हैं, उनको शास्त्र भी नहीं जानता। उन घोर पापोंका प्रायश्चित्त अत्यन्त दुर्लभ है तथापि इस यज्ञसभामें जो ये ब्रह्मनिष्ठ पधारे हुए हैं, उन्हें प्रणामसे प्रसन्न करके हम अपने उद्धारका उपाय पूछें।'

ऐसा निश्चय करके उन दोनोंने ब्राह्मणोंको प्रणाम किया और अपने-अपने पापोंको ठीक-ठीक बताकर उनसे प्रायश्चित्त पूछा। उन दोनोंकी बातें सुनकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने आँखें बंद कर लीं। किसीने कुछ भी नहीं कहा। उनके बीच एक श्रेष्ठ वैष्णव थे, जो उस यज्ञसभामें प्रधान थे। भगवान्‌की भक्तिके माहात्म्यसे उन्होंने समस्त पापोंका नाश कर दिया था। वक्ताओंमें श्रेष्ठ उन वैष्णव ब्राह्मणने हँसकर वहाँ बैठे हुए उन दोनोंसे कहा—'हे ब्राह्मण! और हे क्षत्रियकुमार! यदि तुम दोनों अत्यन्त भयंकर पापराशिसे छुटकारा पाना चाहते हो तो शीघ्र पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चले जाओ। वह सब क्षेत्रोंसे उत्तम है, जहाँ राजर्षि इन्द्रद्युम्नकी भक्तिसे उनपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् पुरुषोत्तम काष्ठमय शरीर धारण करके रहते हैं। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन भगवान् जगन्नाथकी आराधना करके तुम इच्छानुसार पापक्षय और मोक्ष भी पा सकोगे, यह ध्रुव सत्य है। उनका दर्शन करनेसे सब पाप एक साथ ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिये परम पवित्र उत्कलदेशमें दक्षिण समुद्रके तटपर नीलाचलके शिखरपर निवास करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् जगदीशकी शरणमें जाओ। वे करुणानिधान भगवान् तुम दोनोंका मनोरथ अवश्य सिद्ध करेंगे।'

वैष्णव महात्माके इस प्रकार आदेश देनेपर वे ब्राह्मण और क्षत्रिय अत्यन्त हर्षयुक्त हो उसी मार्गसे पुरुषोत्तमक्षेत्रको चल दिये।


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पुण्डरीक और अम्बरीषद्वारा भगवान्‌की स्तुति तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रमें रहकर भजन करनेसे उनकी मुक्तिका वर्णन

जैमिनीजी कहते हैं—उन दोनोंके मनमें निर्वेद (खेद एवं वैराग्य)-का उदय हुआ था। वे कुसंग छोड़कर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए तथा शुद्ध आहार और व्रतका पालन करते हुए कुछ समयमें भगवान् पुरुषोत्तमके नीलाचल-निवासपर पहुँचे। वहाँ तीर्थराजके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके वे मन्दिरके दरवाजेपर खड़े हो गये और साष्टांग प्रणाम करके भगवान्‌का निरीक्षण करने लगे। परंतु उस समय उन्हें भगवद्विग्रहका दर्शन नहीं हुआ। तब चिन्तासे व्याकुल होकर उन्होंने भगवान्‌का दर्शन जबतक न हो जाय तबतकके लिये अनशन आरम्भ किया और भगवान्‌के पापनाशक नामोंका कीर्तन करने लगे। तीसरी रात्रिमें उन्हें एक ज्योतिका दर्शन हुआ। तत्पश्चात् वे पुनः तीन दिनोंतक धैर्यपूर्वक उपवास करते रहे। इस प्रकार