संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कुंज है, उसमें वेदान्तप्रतिपादित साक्षात् भगवान् जगन्नाथजी विराजमान हैं; इनका दर्शन कीजिये। दर्शन करके समस्त पापराशिका विनाश कर डालिये और इसके बाद 'मैं भवसागरमें पड़ा हूँ'— इस शोक और चिन्ताको सदाके लिये त्याग दीजिये।'
तब विद्वान् ब्राह्मण विद्यापतिने प्रसन्नचित्त होकर उस कुण्डमें स्नान किया और दूरसे ही मन, वाणी एवं मस्तकद्वारा भगवान्को प्रणाम करके हर्षगद्गद वचन बोलकर उनकी स्तुति की— 'प्रभो! आप प्रकृति और पुरुषसे सर्वथा अतीत पुरुषोत्तम हैं। सर्वव्यापी एवं परात्पर हैं। इस चराचर जगत्को भिन्न-भिन्न अवस्थाओंमें परिणत करनेवाले आप ही हैं। परमार्थस्वरूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। जगत्पते! श्रुति-स्मृति-पुराण और इतिहासद्वारा प्रतिपादित समस्त कर्मोंसे एकमात्र आपकी ही आराधना होती है। जिनके चरणकमलोंके संयोगसे सर्वतीर्थमयी गंगा सब लोगोंको पवित्र करती हैं, उन परमपावन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। जिनके अंशभूत आनन्दको पाकर सम्पूर्ण विश्वके प्राणी आनन्दमय होकर जीवन धारण करते हैं, समस्त पापोंसे रहित उन ब्रह्मस्वरूप विष्णुको नमस्कार है। प्रभो! आप निर्मलस्वरूप, कल्याणरूप, सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित तथा विश्वसाक्षी हैं, आपको नमस्कार है। आपके असंख्य चरण, नेत्र, मस्तक, मुख और भुजाएँ हैं। आप सबको जीतनेवाले हैं। सभी जीव आपके स्वरूप हैं; आप सर्वरूपी परमात्माको नमस्कार है। भगवन्! इस असार संसारमें चक्कर लगानेके कारण मैं रोग और शोकोंसे बहुत पीड़ित हो गया हूँ और आपके युगल चरणारविन्दोंकी शरणमें आया हूँ। आप इस सांसारिक दुःखसमुदायसे मेरा उद्धार कीजिये।'
प्रणवरूपी देवेश्वर भगवान् विष्णुका इस प्रकार स्तवन करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर विद्यापति ब्राह्मण भगवान् विष्णुके आगे प्रणवमन्त्रका जप करने लगे। जपके अन्तमें शबरने कहा— 'द्विजश्रेष्ठ! इस समय आप भगवान्का दर्शन पाकर कृतार्थ हो गये। दिन बीत गया, आप थके-मांदे और भूखे-प्यासे हैं, अतः चलिये घर चलें। इस घोर वनमें हिंसक जन्तुओंका निवास है; इसलिये हमारा यहाँ ठहरना उचित नहीं है। जबतक सूर्यकी किरणोंका प्रकाश है, तबतक ही हमलोग अपने घर पहुँच जायँ।' ऐसा कहकर ब्राह्मणके साथ शबर शीघ्रतापूर्वक आश्रमको लौटा। ब्राह्मण भी आनन्दसागर भगवान् जगन्नाथके ध्यानमें डूबे हुए थे, अतः उन्हें भूख-प्यास और थकावटसे प्राप्त होनेवाले दुःखोंका भान नहीं हुआ। भगवच्चिन्तनमें संलग्न होनेसे शरीरमें उनकी आस्था नहीं रह गयी थी। वे शरीरस्थितिसे ऊपर उठ चुके थे, इसलिये कण्टकराशिसे व्याप्त शिलाखण्डोंके ऊँचे-नीचे दुर्गम मार्गमें चलते हुए भी कष्टका अनुभव नहीं करते थे। घर आनेपर शबरने ब्राह्मण अतिथिको नाना प्रकारके पवित्र दिव्य पदार्थ देकर भलीभाँति उनका पूजन किया। तदनन्तर शबरके दिये हुए राजोचित उपचारोंसे पूर्णतः तृप्त होकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने चकित होकर कहा— 'साधो! तुमने मेरे सत्कारके लिये जो ये अलौकिक वस्तुएँ समर्पित की हैं, उनका दर्शन राजाओंने भी नहीं किया है। तुम्हारे घरमें ऐसी दिव्य वस्तुओंका संग्रह आश्चर्यकी बात है!'
शबरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवता प्रतिदिन दिव्य उपचार लेकर जगन्नाथजीकी पूजा करनेके लिये आते हैं, पूजा करके भक्तिपूर्वक स्तुति और नमस्कार करते हैं। फिर गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा भगवान्को सन्तुष्ट करके अपने स्थानको लौट जाते हैं। ये सब दिव्य पदार्थ जगन्नाथजीके प्रसाद हैं, जो मैंने आपको अर्पित किये हैं। भगवान्के इस प्रसादको खाकर हमलोगोंके रोग और बुढ़ापेका नाश हो गया है। जिसके