भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 368
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३३९

नीलेन्द्रमणिमय विग्रहवाले भगवान् विष्णुके स्वरूपका यथार्थ वर्णन कीजिये।'

विद्यापति बोले—राजन्! मैं भगवान् जगन्नाथकी उस दिव्य मूर्तिको वर्णन करता हूँ, जिसे इस चर्मचक्षुसे देखकर मनुष्य मोक्षका भाजन बन जाता है। भगवान्‌की वह मूर्ति बहुत प्राचीन तथा इन्द्रनीलमणि नामक प्रस्तरकी बनी है। ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र आदि देवता प्रतिदिन जाकर उसकी पूजा करते हैं। यह दिव्य माला देवताओंने ही पूजामें चढ़ायी थी। राजन्! यह न तो कभी मलिन होती है और न कभी इसकी सुगन्ध ही कम होती है। भगवान्‌के दिव्य उपहारमें आये हुए प्रसादके भक्षण करनेसे मेरे समस्त पाप क्षीण हो गये हैं और मैं देवताओंके सदृश अलौकिक तेजसे सम्पन्न हो गया हूँ। क्या आप इस बातको नहीं देख रहे हैं? महाराज ! वहाँ भोग और मोक्ष दोनों एक ही साथ स्थित हैं। बुढ़ापा, रोग और शोक आदि दुःखोंका वहाँ अत्यन्त अभाव है। उस तीर्थमें विकसित नीलकमलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले साक्षात् भगवान् जगन्नाथ प्रसन्नवदनसे विराजमान हैं, जो शरणागतोंको अमृतमय मोक्ष प्रदान करते हैं।


भगवान् जगन्नाथके नीलमणिमय विग्रहका वर्णन, इन्द्रद्युम्नके पास नारदजीका आगमन और भक्ति एवं भक्तके स्वरूपका विवेचन

इन्द्रद्युम्नने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! जन्मसे लेकर कुछ काल पहलेतक तो आप पुरुषोत्तमक्षेत्रमें कभी गये ही नहीं थे, फिर आपने वहाँके दिव्य वृत्तान्तको कैसे जान लिया ?

विद्यापतिने कहा—राजन्! मैं सन्ध्याके समय पुरुषोत्तमतीर्थमें भगवान् नीलाचलवासी विष्णुके समीप पहुँचा था। उस समय वहाँ दिव्य सुगन्धयुक्त वायु चल रही थी। आकाशमार्गमें देवताओंका सम्मिलित शब्द सुनायी पड़ता था। वहाँ विश्वावसु नामक शबर मेरा मित्र है, उसने दिव्य उपहार, भोजन तथा यह माला मुझे प्रदान की थी। कभी मलिन न होनेवाली यह बहुमूल्य माला लक्ष्मी तथा राज्यका सुख प्रदान करनेवाली है और दरिद्रता एवं पापका संहार करनेवाली है। इसलिये इसे आपके योग्य समझकर मैं यहाँ ले आया हूँ। भगवान् विष्णुका वह उत्तम क्षेत्र सब ओरसे घने जंगलोंसे व्याप्त है। नीलाचल उसकी नाभि (केन्द्रस्थान) है, लंबाई और चौड़ाईमें वह (वर्गके हिसाबसे) पाँच कोसका बताया गया है। तीर्थराज समुद्रके तटपर उसकी स्थिति है और वह सब ओरसे सुवर्णमयी बालुकाद्वारा आवृत है। पर्वतके शिखरपर एक बहुत ऊँचा वटवृक्ष है, जो प्रलयकालमें भी स्थिर रहता है। उसकी लंबाई एक कोसकी