संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 382, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५३
इन्द्रद्युम्नके द्वारा सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान और ध्यानमें भगवान्का दर्शन
मुनियोंने पूछा—महर्षे! उस क्षेत्रमें भगवान् नृसिंहके स्थापित हो जानेपर राजा इन्द्रद्युम्नने क्या किया ?
जैमिनिजी बोले—राजाने सर्वप्रथम इन्द्रादि देवताओंका आवाहन किया। छहों अंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंके विद्वान् सहस्रों ऋषियों और ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया, जो यज्ञविद्यामें कुशल और मीमांसाशास्त्रमें परिनिष्ठित थे। सदाचारी, शुद्ध, कुलीन एवं सत्यवादी वैष्णवोंको भी आदरपूर्वक निमन्त्रित किया। राजाका सभाभवन पत्थरका बना हुआ था। उसकी ऊँचाई बहुत थी और वह चूनेसे लेपा गया था। उसका विस्तार दो कोसका था। उसमें नीचेकी भूमि कहीं रत्नोंसे मढ़ी गयी थी, कहीं सोनेसे, कहीं स्फटिकमणिसे तथा कहीं चाँदीसे। उस भवनके चारों ओर सुखपूर्वक उतरनेके लिये सैकड़ों सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। शुभ दिन और शुभ नक्षत्रमें सब सभासदोंकी बैठक बुलाकर राजाने सबको यथायोग्य आसन दिया। जब सब लोग यथायोग्य स्थानपर सुखपूर्वक बैठ गये, तब राजाने अपने पुरोहितके साथ उपस्थित हो देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंके बीचमें रत्नसिंहासनपर बैठे हुए शचीपति इन्द्रका दिव्य माला, चन्दन, वस्त्र और विष्टर (आसन) आदिके द्वारा सबसे पहले पूजन किया। तत्पश्चात् वैष्णवोंकी पूजा की। फिर नारद और पुरोहितसहित उन्होंने इन्द्रसे कहा—'देवेश्वर! मैं अश्वमेध-यज्ञद्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णुका पूजन करूँगा, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और जबतक सहस्र यज्ञ पूर्ण न हो जायँ, तबतक देवताओंसहित आप इस सभाभवनमें निवास करें। आपने पहले यहाँ जिन शरीरधारी नीलमाधवका दर्शन किया है, वे बालुकाराशिमें छिप गये हैं। उनके पुनः प्रकाशमें आनेपर आपलोगोंका भी कल्याण होगा। इसीलिये मेरा सारा प्रयत्न है।' राजाके इस प्रकार सूचित करनेपर इन्द्रादि देवताओंने कहा—'इन्द्रद्युम्न! तुम सचमुच महात्मा हो। तुमने इस पृथ्वीपर सत्यव्रतका पालन किया है। हमने पहलेसे ही तुम्हारे भविष्य कार्यक्रमको जान लिया है। तुम्हारा यह कार्य तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला है। हम इसमें तुम्हारे सहायक होंगे। तुम भक्तवत्सल भगवान् विष्णुका सहस्र अश्वमेध यज्ञोंद्वारा सुखपूर्वक पूजन करो।'
तदनन्तर राजाने यज्ञके आरम्भके लिये भगवान्का पूजन किया। भगवान् विष्णुको सभाभवनमें इष्टदेवके स्थानपर बिठाकर राजा अपनी पत्नीके साथ निश्चित लग्नकी प्रतीक्षा करने लगे। स्वस्तिवाचन हो जानेपर पुण्याहवाचन और आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। उसके बाद सब सामग्री लेकर राजाने ऋत्विजोंका वरण किया। वरण हो जानेपर उन्होंने सपत्नीक राजाको यज्ञकी दीक्षा दी। वेदीका संस्कार करके उसपर प्रज्वलित आहवनीय अग्निकी स्थापना की गयी। वह अग्नि साक्षात् भगवान् विष्णुका तेज है। फिर प्रोक्षण और अभिमन्त्रण करके उत्तम लक्षणोंवाले अश्वको छोड़ा गया। यज्ञकी दीक्षा लिये हुए राजा मौन होकर मृगचर्मपर बैठे। जबतक महायज्ञका कार्य चलता रहा, तबतक सब मनुष्योंके लिये वहाँ छहः प्रकारके अन्न-पान आदि चतुर रसोइयोंद्वारा तैयार किये जाते थे। उस यज्ञमें प्रतिदिन लोगोंके सम्मान और आदरमें वृद्धि होती थी। साथ ही नित्य नये-नये भोज्यपदार्थ एक-से-एक बढ़कर प्रस्तुत किये जाते थे। वहाँ सर्वत्र प्रयत्न करके लोगोंका आदर-सम्मान किया जाता और आग्रहपूर्वक भोजन कराया जाता था। वहाँ किसीको याचना नहीं करनी पड़ती थी। कोई विमुख नहीं लौटता