संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८१
शरीर है। काष्ठके बहाने सबके जीवनरूप विष्णु साक्षात् शरीर धारण करके यहाँ विराजमान हैं। पापियोंके कलिकालजनित पापका नाश करनेके लिये ही यहाँ भगवान्का प्राकट्य हुआ है। वे यहाँ अपने दर्शन, स्तवन और प्रसादभोजनसे मोक्षदायक होते हैं। भगवान्के प्रसादसे जिसका शरीर व्याप्त है, वह उस विशुद्ध आहारसे विशुद्धात्मा होनेके कारण पातकोंमें लिप्त नहीं होता। भगवान् जगदीश इसी तीर्थमें अर्पित किये हुए नैवेद्यका साक्षात् भोजन करते हैं।
भगवान् विष्णुके श्रीअंगोंसे उतारी हुई तुलसीकी मालाको जो भक्त अपने मस्तक या गलेमें धारण करता है अथवा जो उसे हृदयसे लगाये रखता है या भगवत्प्रसादरूप तुलसीदल भक्षण करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। तुलसीदलसे मिश्रित भगवत्प्रसाद भोजन करके मनुष्य निश्चय ही मोक्ष पाता है। भगवान् विष्णुके आचमन, चरणोदक तथा स्नान-जल सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। शव आदि अपवित्र वस्तुओंके स्पर्शजनित दोषका भी उनके द्वारा नाश होता है। इतना ही नहीं, वे समस्त दीक्षाओं और व्रतोंके फल देनेवाले तथा ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाले हैं। भगवान्का चरणामृत अकालमृत्युका निवारण, रोगसमूहका संहार तथा पापराशिका नाश करनेवाला है। इस प्रकार पुरुषोत्तमतीर्थमें लक्ष्मीजीके साथ निवास करनेवाले भगवान् विष्णु सब लोगोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे निवास करते हुए अनायास ही मोक्ष देते हैं।
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भगवान् पुरुषोत्तमके पार्श्व-परिवर्तन, उत्थापन और प्रावरण आदि उत्सवोंका महत्त्व
जैमिनिजी कहते हैं—जगन्मय भगवान् पुरुषोत्तम सब प्रकारसे इस संसारका कल्याण करनेके लिये ही अनेक प्रकारके रूप और लीलाएँ करते हुए नाना शरीर धारण करके प्रकट होते हैं। अहंकारके बिना कर्मका फल नहीं भोगना पड़ता। अहंकारसे मनुष्य इस संसाररूपी कारागारमें बाँधे जाते हैं। बुद्धि और अहंकारसे युक्त होकर मनुष्य जो कर्म करता है, उसके अनुसार शुभाशुभ फलको पाता है। उन कर्म करनेवाले मनुष्योंमें जो सात्त्विक बुद्धिके लोग हैं, वे फलप्राप्तिकी इच्छा न रखकर मुमुक्षुभावसे केवल भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही कर्म करते हैं। उन सात्त्विक पुरुषोंके द्वारा दर्शन, ध्यान अथवा स्मरण भी करनेपर सर्वभावन भगवान् जगन्नाथ उन्हें मोक्ष प्रदान करते हैं।
भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी एकादशीको जगन्नाथजीके शयनगृहके दरवाजेपर धीरे-धीरे जाकर उसमें प्रवेश करे और शय्यापर सोये हुए उन जगदीश्वरको नमस्कार करके उपचारोंद्वारा उनके चरणोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक प्रणाम करके गुह्य उपनिषदोंसे स्तुति करे। फिर निम्नांकित प्रार्थना करते हुए भगवान्की करवट बदलकर उन्हें उत्तरकी ओर मुँह करके सुला दे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे—'देवाधिदेव जगन्नाथ ! आप अनेकानेक कल्पोंका परिवर्तन करनेवाले हैं, आपसे ही यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् परिवर्तित होता है। भगवन् ! आपने स्वेच्छासे स्वीकार की हुई जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिरूप चेष्टाओंद्वारा जगत्का हित करनेके लिये ही शयन किया है। अब इस समय करवट बदल लीजिये; क्योंकि जगत्का पालन करनेके लिये यह आपके करवट बदलनेका समय प्राप्त हुआ है।'
इस प्रकार भगवान्की प्रार्थना करके व्यजन और चँवर डुलावे तथा सुगन्धित चन्दनका भगवान्के