संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जिज्ञासा की। उस समय गर्गाचार्यजीने देवताओंसे कहा—‘इस समय तुम सब लोगोंका बल ठीक है। तुम्हारे सभी उत्तम ग्रह केन्द्र स्थानमें (लग्नमें, चतुर्थ स्थानमें, सप्तम स्थानमें और दशम स्थानमें) हैं। चन्द्रमासे गुरुका योग हुआ है। बुध, सूर्य, शुक्र, शनि और मंगल भी चन्द्रमासे संयुक्त हुए हैं। इसलिये तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके निमित्त इस समय चन्द्रबल बहुत उत्तम है। यह गोमन्त नामक मुहूर्त है, जो विजय प्रदान करनेवाला है।' महात्मा गर्गजीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर महाबली देवता गर्जना करते हुए बड़े वेगसे समुद्र-मन्थन करने लगे। मथे जाते हुए समुद्रके चारों ओर बड़े जोरकी आवाज उठ रही थी। इस बारके मन्थनसे देवकार्योंकी सिद्धिके लिये साक्षात् सुरभि (कामधेनु) प्रकट हुईं। उन्हें काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंगकी सैकड़ों गौएँ घेरे हुए थीं। उस समय ऋषियोंने बड़े हर्षमें भरकर देवताओं और दैत्योंसे कामधेनुके लिये याचना की और कहा—'आप सब लोग मिलकर भिन्न-भिन्न गोत्रवाले ब्राह्मणोंको कामधेनुसहित इन सम्पूर्ण गौओंका दान अवश्य करें।' ऋषियोंके याचना करनेपर देवताओं और दैत्योंने भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये वे सब गौएँ दान कर दीं तथा यज्ञकर्मोंमें भलीभाँति मनको लगानेवाले उन परम मंगलमय महात्मा ऋषियोंने उन गौओंका दान स्वीकार किया। तत्पश्चात् सब लोग बड़े जोशमें आकर क्षीरसागरको मथने लगे। तब समुद्रसे कल्पवृक्ष, पारिजात, चूत और सन्तान—ये चार दिव्य वृक्ष प्रकट हुए। उन सबको एकत्र रखकर देवताओंने पुनः बड़े वेगसे समुद्र-मन्थन आरम्भ किया। इस बारके मन्थनसे रत्नोंमें सबसे उत्तम रत्न कौस्तुभ प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डलके समान परम कान्तिमान् था। वह अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहा था। देवताओंने चिन्तामणिको आगे रखकर कौस्तुभका दर्शन किया और उसे भगवान् विष्णुकी सेवामें भेंट कर दिया। तदनन्तर, चिन्तामणिको मध्यमें रखकर देवताओं और दैत्योंने पुनः समुद्रको मथना आरम्भ किया। वे सभी बलमें बढ़े-चढ़े थे और बार-बार गर्जना कर रहे थे। अबकी बार उस मथे जाते हुए समुद्रसे उच्चैःश्रवा नामक अश्व प्रकट हुआ। वह समस्त अश्वजातिमें एक अद्भुत रत्न था। उसके बाद गजजातिमें रत्नभूत ऐरावत प्रकट हुआ। उसके साथ श्वेतवर्णके चौसठ हाथी और थे। ऐरावतके चार दाँत बाहर निकले हुए थे और मस्तकसे मदकी धारा बह रही थी। इन सबको भी मध्यमें स्थापित करके वे सब पुनः समुद्र मथने लगे। उस समय उस समुद्रसे मदिरा, भाँग, काकड़ासिंगी, लहसुन, गाजर, अत्यधिक उन्मादकारक धतूर तथा पुष्कर आदि बहुत-सी वस्तुएँ प्रकट हुईं। इन सबको भी समुद्रके किनारे एक स्थानपर रख दिया गया। तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ देवता और दानव पुनः पहलेकी ही भाँति समुद्र-मन्थन करने लगे। अबकी बार समुद्रसे सम्पूर्ण भुवनोंकी एकमात्र अधीश्वरी दिव्यरूपा देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्हें ब्रह्मवेत्ता पुरुष आन्वीक्षिकी (वेदान्त-विद्या) कहते हैं। इन्हींको दूसरे लोग 'मूल-विद्या' कहकर पुकारते हैं। कुछ सामर्थ्यशाली महात्मा इन्हींको वाणी और ब्रह्मविद्या भी कहते हैं। कोई-कोई इन्हींको ऋद्धि, सिद्धि, आज्ञा और आशा नाम देते हैं। कोई योग्य पुरुष इन्हींको 'वैष्णवी' कहते हैं। सदा उद्यममें लगे रहनेवाले मायाके अनुयायी इन्हींको 'माया' के रूपमें जानते हैं। जो अनेक प्रकारके सिद्धान्तोंको जाननेवाले तथा ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न हैं, वे इन्हींको भगवान्की 'योगमाया' कहते हैं। देवताओंने देखा, देवी महालक्ष्मीका रूप परम सुन्दर है। उनके मनोहर मुखपर स्वाभाविक प्रसन्नता विराजमान है। हार और नूपुरोंसे उनके श्रीअंगोंकी बड़ी शोभा हो रही है। मस्तकपर छत्र तना हुआ है, दोनों ओरसे चँवर डुल रहे हैं; जैसे माता अपने पुत्रोंकी ओर स्नेह और दुलारभरी दृष्टिसे देखती है, उसी प्रकार सती महालक्ष्मीने देवता, दानव, सिद्ध, चारण और नाग आदि सम्पूर्ण प्राणियोंकी ओर दृष्टिपात किया।