भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 544
  • वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५१५

स्वामी भगवान् लक्ष्मीपतिने प्रसन्न होकर कहा—'धर्म! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ धर्म! जो तुम्हारे मनको प्रिय हो, ऐसा कोई वर माँगो। जो मनुष्य इस स्तोत्रद्वारा मेरी स्तुति करेगा, वह सब कामनाओंको प्राप्त कर लेगा।'

धर्म बोले—भगवन्! देवदेव जगत्पते! जगद्गुरो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो मैं यहाँ आपकी स्थापना करूँगा।

'एवमस्तु' कहकर सर्वव्यापक भगवान् विष्णु धर्महरिके नामसे प्रसिद्ध हुए। भगवान् धर्महरिका स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। कितनी ही चिन्तासे व्याकुल क्यों न हो, यदि सरयूजीके जलमें स्नान करके मनुष्य भगवान् धर्महरिका दर्शन करता है तो वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है; जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु आदरपूर्वक निवास करते हैं; अतः मनुष्य इसकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकता। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिमें वहाँकी वार्षिक यात्रा विधिपूर्वक सम्पन्न करनी चाहिये। स्वर्गद्वारमें स्नान करके भगवान् धर्महरिका दर्शन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो भगवान् विष्णुके धाममें निवास करता है।

धर्महरिसे दक्षिण दिशामें सोनेकी उत्तम खान है, जहाँ कुबेरने राजा रघुके भयसे सोनेकी वर्षा की थी। पूर्वकालमें इक्ष्वाकुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजा रघु अपनी उदार भुजाओंके बलसे सम्पूर्ण भूमण्डलका शासन करते थे। उनके प्रतापसे संतप्त हुए शत्रुवर्गके लोग उनके उत्तम यशका वर्णन करते थे। प्रजाओंका न्यायपूर्वक पालन करनेवाले उस नीतिमान् राजाने अपने यशके प्रवाहसे दसों दिशाओंको उज्ज्वल प्रभासे आलोकित कर रखा था। उन्होंने दिग्विजययात्राके क्रमसे बहुत अधिक धनका संग्रह किया था। घर लौटकर उन्होंने यज्ञके लिये उत्सुक हो अपनी वंश-परम्पराके योग्य कर्म किया और निर्मल बुद्धिका परिचय दिया। वशिष्ठ मुनिसे आज्ञा लेकर राजा रघुने वामदेव, कश्यप तथा अन्य मुनिवरोंको, जो अनेक तीर्थोंमें निवास करते थे, एक विनयशील ब्राह्मणके द्वारा बुलवाया। प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी उन सब मुनियोंके वहाँ उपस्थित होनेका समाचार पाकर शत्रुविजयी महायशस्वी रघु स्वयं ही राजभवनसे बाहर निकले और उन सबके सामने नतमस्तक होकर यज्ञकी सिद्धिके लिये यह धर्मयुक्त वचन बोले—'मुनिवरो! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान करें।'

मुनि बोले—राजन्! विश्वजित् नामक यज्ञ सब यज्ञोंमें उत्तम है। इस समय उसीका यत्नपूर्वक अनुष्ठान कीजिये।

तब राजाने अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे परम मनोहर प्रतीत होनेवाला वह विश्वदिग्जय (विश्वजित्) नामक यज्ञ किया, जिसमें सर्वस्वकी दक्षिणा दे दी जाती है। नाना प्रकारके दानसे उन्होंने मुनियोंको सन्तोष और हर्ष प्रदान किया और ब्राह्मणोंको अत्यन्त आदरपूर्वक सर्वस्व दान कर दिया। वे सब ब्राह्मण जब राजाद्वारा पूजित होकर अपने-अपने घरोंको चले गये तथा प्रणाम आदिसे सत्कृत हुए मुनि भी अपने आश्रमको पधारे, तब वे सदाचारी राजा रघु विधिपूर्वक किये हुए उस यज्ञसे बड़ी शोभा पाने लगे। इसी समय विश्वामित्र मुनिके शिष्य एवं संयमी पुरुषोंमें श्रेष्ठ कौत्स गुरुकी दक्षिणाके लिये राजाको पवित्र करनेके लिये आये। उनको आया हुआ जान राजा रघु बड़े आदरसे उठे और विधिपूर्वक उनका पूजन किया। राजाने मिट्टीके पात्रोंद्वारा ही कौत्स मुनिका पूजनकार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् कौत्सने कहा—'राजन्! आपका अभ्युदय हो, इस समय मैं अन्यत्र जाता हूँ। आपने अपना सर्वस्व दक्षिणामें दे डाला है। मैं गुरुजीको देनेके लिये धन माँगनेके लिये आया था, किंतु आपके पास धनका अभाव है; इसलिये आपसे याचना नहीं करता।'

मुनिके ऐसा कहनेपर शत्रुविजयी रघुने क्षणभर