भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 546

* वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५१७


कुछ विचार किया; फिर विनयसे हाथ जोड़कर कहा—'भगवन् ! मेरे महलमें एक दिन ठहरिये। तबतक मैं आपके धनके लिये विशेष प्रयत्न करता हूँ।' उदारबुद्धिवाले राजा रघुने यह परम उदारतापूर्ण वचन कहकर धनाध्यक्ष कुबेरको जीतनेकी इच्छासे प्रस्थान किया। कुबेरजीने उन्हें आते देख सन्देश भेजकर उनके मनको संतुष्ट किया और अयोध्यामें ही सुवर्णकी अक्षय वर्षा की। जहाँ वह वर्षा हुई थी, वहाँ सोनेकी उत्तम खान बन गयी। कुबेरकी दी हुई वह सोनेकी खान राजाने मुनिको दिखलायी और उन्हें समर्पित कर दी। मुनीश्वर कौत्सने भी गुरुके लिये जितना आवश्यक था, उतना धन आदरपूर्वक ले लिया और शेष सारा धन राजाको ही निवेदन किया और कहा—'राजन्! तुम्हें अपने कुलके गुणोंसे सम्पन्न सत्पुत्रकी प्राप्ति हो और यह जो सुवर्णकी खान है, वह मनोवांछित फल देनेवाली हो। यहाँ सब पापोंका अपहरण करनेवाला उत्तम तीर्थ हो जाय। वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको यहाँकी वार्षिक यात्रा हो और उसमें मेरे कथनानुसार लोगोंको अनेक प्रकारके अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो।'

इस प्रकार राजाको वर देकर संतुष्ट चित्तवाले कौत्स मुनि अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये उत्कण्ठापूर्वक गुरुके आश्रमपर चले गये।

सम्भेदतीर्थ, सीताकुण्ड, गुप्तहरि और चक्रहरि तीर्थकी महिमा

सूतजी कहते हैं—स्वर्णखनिसे दक्षिण दिशामें सिद्धसेवित 'सम्भेद' तीर्थ है, जो तिलोदकी और सरयूके संगमसे विख्यात हुआ है। महाभाग! उसमें स्नान करके मनुष्य पापरहित होते हैं। दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे जो फल होता है, वही धर्मात्मा पुरुष नियमपूर्वक उसमें स्नान करके प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य वहाँ वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको सुवर्ण आदि देता है, वह उत्तम गतिको पाता है। भादोंके कृष्ण पक्षकी अमावास्याको वहाँकी यात्रा होती है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने दूसरे समुद्रकी भाँति उस नदीका निर्माण किया था। उसमें तिलकी तरह काले रंगका जल सदा शोभा पाता था। इसलिये वह पुण्यसलिला नदी 'तिलोदकी' नामसे विख्यात हुई। पवित्र व्रत धारण करनेवाला मनुष्य संगमसे अन्यत्र भी यदि तिलोदकीमें स्नान करे तो वह सात जन्मके पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंको यत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ किये हुए स्नान, दान, व्रत, होम सभी अक्षय होते हैं। उस संगमसे पश्चिम दिशामें तटपर 'सीताकुण्ड' नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। सीताजीने स्वयं ही उस कुण्डका निर्माण किया है तथा श्रीरामचन्द्रजीने वरदान देकर उसे महान् फलोंकी निधि बना दिया है।

(चित्र: सीता-राम एवं मन्दिर-दर्शन)

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