भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परलोकमें कभी दुःखका भागी नहीं होता। संसारमें कामधेनु, चिन्तामणि तथा कल्पवृक्ष जिस प्रकार मनुष्योंको अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, वैसे ही सेतुस्नान मनुष्योंके सब मनोरथ पूर्ण करता है। जो मनुष्य सेतुतीर्थमें जानेवाले पुरुषको धन-धान्य अथवा वस्त्र आदि देकर उसमें प्रवृत्त कराता है, वह अश्वमेधादि यज्ञोंके उत्तम फलको पाता है। उसके ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश हो जाता है। जो मनुष्य 'मैं सेतुतीर्थमें जाऊँगा' ऐसा कहकर दूसरोंसे धन लेता है और लेकर लोभवश नहीं जाता, उसको ब्रह्मघाती कहते हैं। जो सम्पन्न होकर भी दरिद्रकी भाँति सेतुतीर्थमें जानेके लिये लोभवश धनकी याचना करता है, उसे विद्वानोंने चोर कहा है। जिस किसी उपायसे हो सके, मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक सेतुतीर्थकी यात्रा करे। जो वहाँतक जानेमें असमर्थ हो, वह ब्राह्मणको दक्षिणा देकर उससे वहाँकी यात्रा करवावे।


सेतुबन्धकी कथा तथा सेतुमें स्थित मुख्य-मुख्य तीर्थोंके नाम

ऋषियोंने पूछा—महाभाग सूतजी! अनायास ही सब कार्य करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने अगाध समुद्रमें किस प्रकार सेतु बाँधा? सेतुतीर्थमें एवं गन्धमादन पर्वतपर कितने तीर्थ हैं? ये सब हमें बताइये।

श्रीसूतजीने कहा—मुनिवरो! पिताकी आज्ञासे भगवान् श्रीराम सीताजी और लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्यके अन्तर्गत पंचवटीमें एकाग्रचित्त होकर निवास करते थे। वहाँ रहते हुए महात्मा रघुनाथजीकी पत्नी सीताको मारीचद्वारा छल करके रावणने हर लिया। दशरथनन्दन श्रीराम उस वनमें अपनी पत्नी सीताकी खोज करते हुए किष्किन्धामें पम्पासरोवरके तटपर गये। वहाँ उन्हें कोई वानर दिखायी दिया। उस वानरने निकट आकर श्रीरामचन्द्रजीसे पूछा—'आप कौन हैं?' तब उन्होंने अपना सब वृत्तान्त प्रारम्भसे ही उसको कह सुनाया। तत्पश्चात् श्रीरामने भी वानरसे पूछा—'तुम कौन हो?' तब उसने महात्मा राघवेन्द्रको अपना परिचय इस प्रकार दिया—'मैं सुग्रीवका मन्त्री हनुमान् नामक वानर हूँ। सुग्रीवके भेजनेसे मैं यहाँ आया हूँ। वे आप दोनोंसे मित्रता करना चाहते हैं। आपका कल्याण हो, आप दोनों शीघ्र ही सुग्रीवके समीप चलें।' 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्जीके साथ सुग्रीवके समीप आये। सुग्रीवने उनके साथ अग्निको साक्षी देकर मित्रता स्थापित की। श्रीरामचन्द्रजीने उनसे बालिके वधकी प्रतिज्ञा की और सुग्रीवने विदेहराजनन्दिनी सीताको पुनः खोज लानेके लिये प्रतिज्ञा की। इस प्रकार प्रतिज्ञापूर्वक परस्पर विश्वास करके वे दोनों नरराज और वानरराज प्रसन्नतापूर्वक ऋष्यमूक पर्वतपर रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको अपनी शक्तिका विश्वास दिलानेके लिये दुन्दुभि दानवके शरीरको शीघ्र ही पैरके अंगूठेसे मारकर अनेक योजन दूर फेंक दिया तथा एक ही बाणसे सात ताल बींध डाले। यह सब देखकर सुग्रीवके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'रघुनन्दन! मुझे इन्द्र आदि देवताओंसे भी भय नहीं है, क्योंकि आप-जैसे अत्यन्त पराक्रमी वीर मुझे मित्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं। मैं लंकापति रावणको मारकर आपकी पत्नी सीताको यहाँ ले आऊँगा।'

तदनन्तर लक्ष्मण, सुग्रीव और महाबली श्रीरामचन्द्रजी बालिके द्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरीमें शीघ्रतापूर्वक गये। वहाँ बालिको युद्धके लिये बुलानेकी इच्छासे सुग्रीवने बड़ी भारी गर्जना की। अपने छोटे भाईकी वह गर्जना बालि नहीं सह सका। वह अन्तःपुरसे बाहर निकला और सुग्रीवसे भिड़ गया। बालिके मुक्केकी मारसे आहत हो सुग्रीव बहुत व्याकुल हो गये और शीघ्र ही वहाँ चले