संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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लगा। उस समय भगवान् शंकर प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गये। उनका दर्शन करके उसने भगवान् शिवका इस प्रकार स्तवन किया— 'देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। करुणाकर शंकर! विपत्ति-रूपी समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंको पार लगानेके लिये आपके चरणारविन्द जहाजरूप हैं। मृत्युंजय! त्रिलोचन! आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरी रक्षा कीजिये।'
इस प्रकार स्तुति करनेपर महादेवजी प्रसन्न हो अश्वत्थामासे बोले— 'द्रोणकुमार! सोते हुओंको मारनेके कारण जो तुम्हें पाप लगा था, वह धनुष्कोटिमें नहानेसे दूर हो गया। अब तुम कोई वर माँगो।'
अश्वत्थामा बोला— 'महेश्वर! आज आपके दर्शनमात्रसे मैं कृतार्थ हो गया। आपके चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति हो।' 'तथास्तु' कहकर देवदेव महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार पापरहित, शुद्ध एवं निर्मल हुए अश्वत्थामाको उस समयसे सभी महर्षियोंने ग्रहण किया।
धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुका पापसे उद्धार
सूतजी कहते हैं—पहलेकी बात है, बृहद्द्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक महाबली चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। वे समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। उन्होंने सत्रयागद्वारा इन्द्र आदि देवताओंका यजन किया। परम विद्वान् धर्मात्मा रैभ्यजी उनके पुरोहित थे। रैभ्यके दो पुत्र हुए, अर्वावसु और परावसु। वे दोनों छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् तथा श्रौत-स्मार्त कर्मोंके तत्त्वज्ञ थे। न्याय, मीमांसा, सांख्य, वेदान्त, वैशेषिक, योगशास्त्र और व्याकरणशास्त्रके मर्मज्ञ विद्वान् थे। मनु आदि धर्मशास्त्रोंके वे निष्णात पण्डित और सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें चतुर थे। इन दोनों विद्वानोंको सत्रयागमें सहायता करनेके लिये राजा बृहद्द्युम्नने माँगा। पिताकी आज्ञा ले वे दोनों भाई बृहद्द्युम्नके सत्रमें गये। वे युगल अश्विनीकुमारोंकी भाँति परम सुन्दर दिखायी देते थे। रैभ्य मुनि जेठी पुत्रवधूके साथ स्वयं ही आश्रमपर रह गये थे।
उन दोनों बन्धुओंने वहाँ जाकर राजा बृहद्द्युम्नके यज्ञको बड़ी उत्तमतासे सम्पन्न कराया। जब वह यज्ञ होने लगा, तब राजाके बुलाये हुए सभी मुनि उस यज्ञको देखनेके लिये आये। उनको आया हुआ देख महाराज बृहद्द्युम्नने सबका आदरपूर्वक अर्घ्य आदिसे सत्कार किया। उसी समय आमन्त्रित हुए राजालोग आदरपूर्वक वह यज्ञोत्सव देखनेके लिये अनेक दिशाओंसे चतुरंगिणी सेनाके साथ आये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—इन चारों वर्णों तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन चारों आश्रमोंके लोग भी वहाँ जुटे हुए थे। श्रेष्ठ राजाने उन सबका यथायोग्य सत्कार किया और सबको भोजनके लिये अन्न, घी आदि पदार्थ दिये। वस्त्र, सुवर्ण, हार एवं नाना प्रकारके रत्न भी भेंट किये। इस प्रकार राजा बृहद्द्युम्नने यज्ञमें पधारे हुए सभी अतिथियोंका सत्कार किया।
रैभ्यके पुत्र अर्वावसु और परावसुने यज्ञ आदि कर्मोंको बिना किसी भूलके विधिपूर्वक कराया। उन दोनों भाइयोंकी निपुणता देखकर वसिष्ठ आदि सभी महर्षियोंने उनकी प्रशंसा की। परावसु कुछ कर्म कराकर तृतीय सवनके अन्तमें सायंकालके समय घरका काम-काज देखनेके लिये चले गये। उस समय रैभ्य मुनि काला मृगचर्म ओढ़कर वनमें विचर रहे थे। उन्हें देखकर परावसुके मनमें मृगकी आशंका हुई। रात्रिमें निविड़ अन्धकारमें उनके नेत्र निद्रासे