भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पहुँचकर इस प्रकार कहा—'उस महापातकके निवारणका उपाय तुम्हें हम बता रहे हैं। दक्षिण समुद्रके तटपर जो परम पवित्र मोक्षदायक रामसेतु है, उसीपर धनुष्कोटि नामसे विख्यात एक परम उत्तम मुक्तिदायक तीर्थ है, जो ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्णकी चोरी, गुरुशय्यागमन तथा इन सबके संसर्गरूप महापातकोंका विनाश करनेवाला है। जो मनुष्य मनमें कोई कामना नहीं रखकर उसमें स्नान करता है, उसको वह तीर्थ मोक्षफल प्रदान करता है। वह दुःस्वप्नों तथा नरकके क्लेशोंका नाश करनेवाला एवं धन्य है। तुम्हारा ज्येष्ठ भाई परावसु यदि वहीं जाकर स्नान करे तो तत्काल ब्रह्महत्यासे मुक्त हो सकता है।' यों कहकर देवतालोग अपनी पुरीको चले गये।

तदनन्तर अर्वावसु अपने बड़े भाई परावसुको साथ ले श्रीरामचन्द्रजीके धनुष्कोटि नामक तीर्थमें गया। परावसुने पातकशुद्धिके लिये उस सेतुवर्ती तीर्थमें संकल्प करके अपने भाईके साथ नियमपूर्वक स्नान किया। स्नान करके जब वे उठे, तब आकाशवाणीने कहा—'परावसो! तुम्हारी पितृहत्या और ब्रह्महत्या नष्ट हो गयी।' तब छोटे भाईके साथ परावसुने श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और रामेश्वर महादेवको भक्तिभावसे मस्तक नवाकर दोनों भाई अपने पिताके आश्रमपर गये। वहाँ रैभ्य मुनि मरकर पुनः जीवित हो गये थे। उन्होंने अपने दोनों पुत्रोंको आया देख मन-ही-मन बड़े सन्तोषका अनुभव किया और पुत्रोंके साथ वे आश्रमपर सुखपूर्वक रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुके पातकका नाश हो गया था। इसलिये सब मुनियोंने उन्हें स्वीकार किया।

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धनुष्कोटिकी महिमा; सियार, वानर तथा दुराचार ब्राह्मणकी कथा और महालय श्राद्धकी आवश्यकता

सूतजी कहते हैं— अब मैं धनुष्कोटिकी प्रशंसामें सियार और वानरके संवादका वर्णन करता हूँ। प्राचीन कालमें एक स्थानपर सियार और वानर रहते थे। दोनोंको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वे दोनों परस्पर मित्र थे। सियारका नाम रुद्रभूमिष्ठ था। एक समय वानरने शृगालको श्मशानभूमिमें देखकर पूर्वजन्मका स्मरण करते हुए पूछा—'सियार! तुमने पूर्वजन्ममें कौन-सा अत्यन्त भयंकर पाप किया था, जिससे तुम श्मशानभूमिमें घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दोंको खा रहे हो?' वानरके ऐसा पूछनेपर सियारने कहा—'वानर! मैं पूर्वजन्ममें वेदोंका पारंगत विद्वान् और समस्त कर्मकलापोंका ज्ञाता ब्राह्मण था। मेरा नाम वेदशर्मा था। मैंने उस जन्ममें एक ब्राह्मणको धन देनेके लिये संकल्प करके भी वह धन उसे नहीं दिया, उसीसे सियार हुआ और अब इस प्रकारके अत्यन्त घृणित पदार्थोंको खाता हूँ। जो दुरात्मा देनेकी प्रतिज्ञा करके भी कोई वस्तु नहीं देते हैं, वे अत्यन्त घृणित सियारकी योनिको प्राप्त होते हैं। वानर! ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके यदि वह वस्तु उसे न दी जाय, तो उसी क्षण उसके दस जन्मोंका पुण्य नष्ट हो जाता है। इसलिये समझदार मनुष्यको उचित है कि वह देनेकी प्रतिज्ञा करनेपर उस वस्तुको अवश्य दे डाले।'

ऐसा कहकर सियारने वानरसे पूछा— तुमने क्या पाप किया था, जो वानर हो गये?

वानर बोला— पूर्वजन्ममें मैं भी ब्राह्मण था। मेरा नाम वेदनाथ था। मेरे पिता विश्वनाथ नामसे विख्यात थे और मेरी माताका नाम कमलालया था। सियार! पूर्वजन्ममें भी हमारी तुम्हारी मित्रता