संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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द्वारा एक न करनेयोग्य कार्य हो गया है। अब उस भूलके दुष्परिणामसे पार पाना हमारे लिये कठिन है। भूल यह हुई कि हम अज्ञानियोंने अपने अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र महर्षि दधीचिके आश्रममें रख दिये थे। उन शस्त्रोंके बिना इस समय हम क्या कर सकते हैं?'
तदनन्तर ब्रह्माजीकी आज्ञासे सब देवता दधीचिके आश्रमपर गये और उनसे बोले—'देव! हमने पूर्वकालमें जो अस्त्र-शस्त्र यहाँ रख दिये थे, वे सब हमें दे दिये जायें।' यह सुनकर दधीचिने हँसते हुए कहा—'बड़भागी देवताओ! आपके उन अस्त्रोंको बहुत कालसे यहाँ व्यर्थ रखा हुआ जानकर मैंने सबको पी लिया।' उनकी यह बात सुनकर देवता बहुत चिन्तित हुए और पुनः ब्रह्माजीके पास लौटकर मुनिकी सब बातें कह सुनायीं। तब ब्रह्माजीने सबके अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये देवताओंसे कहा—'तुम लोग दधीचिसे उनकी हड्डियाँ ही माँगो। माँगनेपर वे देंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर इन्द्र बोले—'वृत्रासुर नामक जो दैत्यराज है, उसे विश्वकर्माने उत्पन्न किया है (अतः वह ब्राह्मण ही है); यद्यपि वह निरन्तर अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला है, तथापि ब्राह्मण होनेके कारण मैं उसका वध कैसे कर सकता हूँ।' इन्द्रकी बात सुनकर ब्रह्माजीने अर्थशास्त्रको प्रधानता देनेवाली युक्तिसे उन्हें समझाया और इस प्रकार कहा—'देवराज! यदि कोई आततायी मारनेकी इच्छासे आ रहा हो तो वह तपस्वी ब्राह्मण ही क्यों न हो, उसे अवश्य मार डालनेकी इच्छा करे। ऐसा करनेसे वह ब्रह्महत्यारा नहीं हो सकता।'* ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने कहा—'भगवन्! दधीचिके वधसे निश्चय ही मेरा पतन हो जायगा। उस ब्राह्मणकी हत्यासे सभी तरहके महान् पाप अपनेको लगेंगे। अतः हमें ब्राह्मणोंका अनादर नहीं करना चाहिये। परम धर्म अदृष्टरूप है। विज्ञ पुरुषको उचित है कि वह श्रेष्ठ विधिके अनुसार मनोयोगपूर्वक उस धर्मका पालन करे।'
इन्द्रके निःस्पृह वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले—'देवेन्द्र! तुम अपनी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करो और शीघ्र ही दधीचिके पास जाओ। कार्यकी गुरुताको दृष्टिमें रखकर दधीचिकी हड्डियाँ माँगो।' 'बहुत अच्छा' कहकर इन्द्रने ब्रह्माजीकी आज्ञा स्वीकार की और गुरु बृहस्पति तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ दधीचिके मंगलमय आश्रमपर गये। वह आश्रम नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे संयुक्त होनेपर भी पारस्परिक वैर-भावसे रहित था। वहाँ बिल्ली और चूहे एक-दूसरेको देखकर प्रसन्न होते थे। एक ही स्थानपर सिंह, हथिनियाँ, हाथीके बच्चे और हाथी परस्पर मिलकर नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते थे। नेवलोंके साथ मिले हुए सर्प एक-दूसरेसे आनन्दका अनुभव करते थे। ऐसी-ऐसी अनेक आश्चर्यभरी बातें उस आश्रमपर दिखायी देती थीं। दधीचि मुनि अपने उत्तम तेजसे सूर्य अथवा दूसरे अग्निदेवकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी सुवर्चा भी थीं। जैसे सावित्रीके साथ ब्रह्माजी शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे मुनिश्रेष्ठ दधीचि भी अपनी धर्मपत्नीके साथ सुशोभित थे। सम्पूर्ण देवताओंने मुनिका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'मुने! हमें पहलेसे ही विदित है कि आप तीनों लोकोंमें सबसे बड़े दाता हैं।' देवताओंकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि बोले—'श्रेष्ठ देवगण! आपलोग जिस कामके लिये आये हैं, उसे बतावें। आपकी माँगी हुई वस्तु मैं अवश्य दूँगा, इसमें सन्देह नहीं है। मेरी बात कभी मिथ्या नहीं होती।' तब अपना स्वार्थ सिद्ध करनेकी इच्छावाले सब देवता एक साथ बोले—'ब्रह्मन्! हमलोग भयभीत होकर आपके दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ
* आततायिनमायान्तं ब्राह्मणं वा तपस्विनम्। हन्तुकामं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत्॥
(स्क० पु०, मा० के० १६।७३)