संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 634, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६०५
नमस्कार है। नीलकण्ठ ! आपका स्वरूप तेजोमय है, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ध्यान करनेवाले मनुष्य आपके स्वरूपका जिस प्रकार चिन्तन करते हैं, उसके अनुरूप ही विग्रह धारण करके आप प्रकट होते हैं, आपको नमस्कार है। केवल भक्तिभावसे प्राप्त होनेवाले आप प्रभुको नमस्कार है। ब्रह्माजीके रूपमें आपको नमस्कार है। विष्णुरूपधारी प्रभो! आपको नमस्कार है। आप ही स्थूल और सूक्ष्म जगत् हैं, आपको नमस्कार है। अणुरूपधारी आपको नमस्कार है। कामरूपमें प्रकट हुए अथवा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप ही सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप नित्य, सौम्य, मृड (सुखस्वरूप) एवं श्रीहरि हैं, आपको बारंबार नमस्कार है, आप ही सब ओरसे तपानेवाले सूर्य तथा शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सृष्टिस्वरूप ! आपको नमस्कार है। लोकपाल ! आपको नमस्कार है। आप रुद्र, भीम एवं शान्तस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आपके रूप अनन्त हैं, आप सम्पूर्ण विश्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। चन्द्रशेखर ! आपके सब अंगोंमें भस्म लगा हुआ है, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आपके पाँच मुख एवं तीन नेत्र हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। सर्प आपके आभूषण हैं तथा आप दिशाओंको ही वस्त्रके रूपमें धारण करते हैं, आप अन्धकासुरका विनाश करनेवाले और दक्षके पापको हर लेनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। त्रिपुरारे ! आपने कामदेवको भस्म किया है, आपको नमस्कार है। मेरे द्वारा कहे हुए इन चालीस नामोंका जो पाठ करे और पवित्र होकर तीनों काल इसको पढ़े अथवा सुने, वह सब पापोंसे छूटकर कैलाशधामको जाय।'
इस प्रकार धर्मराजने प्रणाम करके जब बड़ी भक्तिसे भगवान् शिवका स्तवन किया, तब शिवजीने कहा—'महाभाग ! तुम्हारे मनमें जो कोई अभिलाषा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो।'
यमराजने कहा—देव! शंकर! यदि मुझे आप मनोवांछित वर देते हैं तो इस महाक्षेत्रमें आप मेरे नामसे प्रसिद्ध होकर निवास कीजिये। यह स्थान धर्मारण्यके नामसे तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि प्राप्त करे।
महादेवजी बोले—धर्मराज ! यह स्थान प्रत्येक युगमें सदा धर्मारण्यके नामसे विख्यात होगा। तुम्हारे मनमें और भी कोई इच्छा हो तो बताओ, उसे भी पूर्ण करूँगा।
धर्मराजने कहा—भगवन् ! दो योजन विस्तारवाला यह उत्तम स्थान मेरे नामसे प्रसिद्ध तीर्थ हो। यह समस्त देहधारियोंके लिये पावन एवं सनातन मोक्षस्थान हो।
महादेवजी बोले—'एवमस्तु' एक अंशसे इस तीर्थमें मेरी भी स्थिति होगी। तुम्हारे इस निर्मल स्थानको मैं कभी नहीं छोडूंगा। यहाँ मेरे नामसे विश्वेश्वर नामक महालिंग प्रकट होगा।
ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् वहाँ एक अद्भुत लिंग प्रकट हुआ। धर्मके द्वारा स्थापित किया हुआ वह लिंग धर्मेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका स्मरण और पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मराजने वहींपर एक धर्मवापीका निर्माण किया, जो बड़ी मनोरम है। उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य व्याधिदोषके नाश और क्लेशकी शान्तिके लिये उस धर्मवापीमें स्नान करके यमतर्पण करता है, उसको कोई उपद्रव नहीं होता। अँतरिया, तिजारी, चार दिनोंपर होनेवाला ज्वर, किसी नियत समयपर होनेवाला ज्वर तथा शीतज्वर आदि जितने भी रोग हैं, सभी उस मनुष्यको पीड़ा नहीं देते। जो मानव उस परम पुण्यमयी