भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अद्भुत स्वरमें गर्जना करने लगे। देवताओं और दानवोंके उस युद्धमें बजाये जानेवाले भयानक बाजे बड़ी गम्भीर ध्वनिमें सुनायी देते थे। उस युद्धमें समस्त चराचर जगत् महान् भयके कारण अचेत हो गया। उस समय नमुचि नामक दैत्य इन्द्रके साथ युद्ध करने लगा। देवराज इन्द्रने बड़े वेगसे उस दैत्यपर वज्रका प्रहार किया, परंतु वज्रके आघातसे भी नमुचिका एक रोम भी न टूट सका। तब इन्द्रने नमुचिपर गदा मारी, किंतु वह गदा भी चूर-चूर हो गयी। यह देख इन्द्रने एक बहुत बड़े शूलसे उस दैत्यपर प्रहार किया। नमुचिके अंगका स्पर्श होते ही उस शूलके सैकड़ों टुकड़े हो गये। इसी प्रकार नमुचिने भी हँसते हुए अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे देवताओंको मारा, परंतु इन्द्रपर प्रहार नहीं किया। उस समय इन्द्र मौन होकर बड़ी भारी चिन्तामें डूब गये। इसी बीचमें उस महाभयानक संग्रामके भीतर इन्द्रको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—‘महेन्द्र! यह दैत्य देवताओंके लिये बड़ा भयंकर और घोरतर है। इसके लिये जलसे निकला हुआ फेन ही दुर्लङ्घ्य शस्त्र है। अतः उसीके द्वारा इस महान् असुरका शीघ्र संहार करो। दूसरे किसी शस्त्रसे आघात करनेपर यह असुर कभी मारा नहीं जा सकता।’ इस मंगलमयी दैवी वाणीको सुनकर अनन्त पराक्रमवाले इन्द्र समुद्रके तटपर गये और फेन प्राप्त करनेके लिये प्रयास करने लगे। इन्द्रको समुद्रतटपर आया हुआ देख नमुचि क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा और शूलसे आघात करके उन्हें कटुवचन सुनाने लगा। तब इन्द्रने भी क्रोधमें भरकर अद्भुत फेन ग्रहण किया और उस फेनका प्रहार करके महादैत्य नमुचिको मार गिराया। इस प्रकार नमुचिके मारे जानेपर सब देवता और ऋषि साधुवाद देते हुए इन्द्रके प्रति सम्मान प्रकट करने लगे।

इसी समय महातेजस्वी वृत्रासुर इन्द्रके समीप आया। वृत्रासुरको देखकर सब देवता और मनुष्य महान् भयसे युक्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े। तब प्रतापी इन्द्र हाथमें वज्र लिये ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए। सब देवता प्रतापी लोकपालोंके साथ युद्धके लिये एकत्र हो गये; परंतु वृत्रासुरको देखते ही सब लोकपाल अपने स्वामी इन्द्रसहित भयभीत हो गये। अतः वे भगवान् शिवकी शरणमें गये। महेन्द्र विजयके इच्छुक थे। अतः उन्होंने गुरु बृहस्पतिके बताये अनुसार बड़े विश्वासके साथ तत्काल ही विधिपूर्वक शिवलिंगका पूजन किया। फिर उदार बुद्धिवाले बृहस्पतिजी इन्द्रसे इस प्रकार बोले—‘‘देवराज! कार्तिकमासके शुक्ल पक्षमें शनिवारके दिन यदि पूरी त्रयोदशी मिले तो यह समझना चाहिये कि मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। उस दिन प्रदोषकालमें सब कामनाओंकी सिद्धिके लिये लिंगरूपधारी भगवान् सदाशिवका पूजन करना चाहिये। दोपहरके समय स्नान करके तिल और आँवलेके साथ गन्ध, पुष्प और फल आदिके द्वारा शिवजीकी पूजा करे। फिर प्रदोषकालमें स्थावर लिंगका पूजन करे। गाँवसे बाहर जो शिवलिंग स्थित है, उसके पूजनका फल ग्रामकी अपेक्षा सौगुना अधिक है। उससे भी सौगुना अधिक माहात्म्य उस शिवलिंगके पूजनका है, जो वनमें स्थित हो। वनकी अपेक्षा भी सौगुना पुण्य पर्वतपर स्थित शिवलिंगके पूजनका है। पर्वतीय शिवलिंगकी अपेक्षा तपोवनमें स्थित शिवलिंगके पूजनका फल दस हजार गुना अधिक है। वह महान् फलदायक है। अतः विद्वानोंको इस विभागके अनुसार शिवलिंगका पूजन करना चाहिये और तडाग आदि तीर्थोंमें विधिवत् स्नान आदि करना चाहिये। मिट्टीके पाँच पिण्ड निकाले बिना किसी बावड़ीमें स्नान करना शुभकारक नहीं है। कुएँमेंसे अपने हाथसे जल निकालकर स्नान नहीं करना चाहिये (रस्सी आदिकी सहायतासे किसी पात्रमें जल निकालकर ही स्नान करना चाहिये)। पोखरेमेंसे मिट्टीके दस पिण्ड निकालकर ही स्नान करना चाहिये। नदीमें स्नान करना सबसे उत्तम है, यदि कोई बड़ी नदी मिल जाय