संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२७
बन गया। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और उसका शरीर कोढ़ आदि रोगोंसे पीड़ित नहीं होता। राजन्! इस प्रकार तुमसे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बतलाया। देवताओंने वहाँ भगवान् सूर्यको वकुलवनके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। साथ ही वहाँ संज्ञारानी और दोनों अश्विनीकुमारोंकी भी स्थापना की गयी। जो मनुष्य इन्द्रियोंको संयममें रखकर श्रद्धापूर्वक सूर्यकुण्डमें स्नान करता है, वह महानरकमें पड़े हुए पितरोंका भी उद्धार कर देता है। जो श्रद्धापूर्वक देवताओं और पितरोंका तर्पण करके उस कुण्डका जल पीता है, उसका पुण्य कोटिगुना होता है। रविवारयुक्त सप्तमीमें तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय जो सूर्यकुण्डमें स्नान करते हैं, वे फिर गर्भमें नहीं जाते। संक्रान्ति, व्यतीपात और वैधृति योगमें, पर्वोंके अवसरपर, शुक्ल और कृष्ण पक्षकी पूर्णिमा, अमावास्या एवं चतुर्दशीको जो सूर्यकुण्डमें स्नान करता है, उसे कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य एकचित्त होकर वकुलादित्यका पूजन करता है, वह जबतक सूर्यदेव तपते हैं तबतक परम धाममें निवास करता है। उसे कभी सर्पका भय नहीं होता। भूत और प्रेत आदिकी बाधा भी नहीं प्राप्त होती। जो मनुष्य रोगग्रस्त हो, वह सूर्यकुण्डमें छः महीनेतक स्नान करनेसे सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! जो मनुष्य इस धर्मारण्यक्षेत्रमें कन्यादान करता है, वह उस विवाहयज्ञसे पवित्रचित्त होकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इस क्षेत्रमें गोदान, शय्यादान, मूँगा, घोड़ा, दासी, भैंस, तिल एवं सुवर्णका दान करना चाहिये। रविवारयुक्त सप्तमी तिथिमें जो वकुलादित्यका स्मरण करता है, उसे ज्वर आदि रोगों, शत्रुओं तथा व्याधियोंसे भय नहीं प्राप्त होता।
**युधिष्ठिरजीने पूछा—**मुने! वहाँ भगवान् सूर्यका वकुलार्क अथवा वकुलादित्य नाम कैसे पड़ा?
**व्यासजी बोले—**राजेन्द्र! जब संज्ञारानीने भगवान् सूर्यकी प्राप्ति तथा उनके तेजकी शान्तिके लिये एकचित्त होकर वकुल-वृक्षके नीचे तपस्या की, उस समय उस वृक्षके नीचे आकर भगवान् सूर्य बहुत शान्त हो गये। तभी रानीने दो परम मनोहर दिव्यरूपधारी पुत्र उत्पन्न किये। इसीसे भगवान् सूर्यका नाम वकुलार्क हुआ। जो वहाँ स्नान करता है, उसे कोई व्याधि पीड़ा नहीं देती तथा वह धर्म, अर्थ एवं कामको प्राप्त करता है। वहाँ छः महीनेमें मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है और वह अन्तमें मोक्ष पाता है।
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इन्द्रेश्वरकी स्थापना और उनकी महिमा, देवमज्जनक तड़ागका माहात्म्य तथा लोहासुरके अत्याचारसे धर्मारण्यकी जनताका पलायन
**व्यासजी कहते हैं—**भारत! धर्मारण्यपुरसे उत्तर दिशामें देवराज इन्द्रने भगवान् शंकरको प्रसन्न करनेके लिये तीन सौ वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तप किया। वृत्रासुरके वधसे जो पाप लगा था, उसको दूर करनेके लिये ही इन्द्र जितेन्द्रिय एवं एकाग्रचित्त होकर भगवान् शंकरकी आराधनामें लगे थे। उस समय भगवान् चन्द्रशेखर उनकी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हुए और उनके समीप आकर बोले—‘देवराज! तुम जो कुछ माँगते हो, उसे मैं दूँगा।’
**इन्द्रने कहा—**देवेश्वर! कृपासिन्धु महेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो वृत्रासुरके मरनेसे जो पाप लगा है, उसका नाश कीजिये।