भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 666, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 666
  • ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६३७

जो उसके जलका स्पर्श करता है, वह पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। दोनोंका संगम देखकर अथवा समुद्रकी ध्वनि सुनकर ब्रह्महत्यासे युक्त मनुष्य भी पवित्र हो परम गतिको प्राप्त होता है। जो मनुष्य माघ मासमें प्रयागमें गोता लगाता है, वह इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुधामको प्राप्त होता है। जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें तीन राततक ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक निवास करते हैं, वे यमलोक एवं कुम्भीपाक आदिका दर्शन नहीं करते। जो मनुष्य नैमिषारण्यमें निवास करता है, वह देवत्वको प्राप्त होता है। श्रीराम! जो मनुष्य कुरुक्षेत्रमें चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर स्नान करके सुवर्णदान करता है, उसका इस लोकमें पुनर्जन्म नहीं होता। जो मनुष्य इस पृथ्वीपर कपिला गौको स्पर्श करके दान देता है, वह कामधेनु गौओंके निवासभूत ऋषिलोकको जाता है। जो वैशाख मासमें उज्जयिनीपुरीमें क्षिप्राके जलमें स्नान करता है, वह अपने सहस्रों पूर्वजोंको घोर रौरव नरकसे छुटकारा दिला देता है। जो मनुष्य तीन दिनोंतक सिन्धुनदी अथवा समुद्रमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो कैलासमें आनन्द भोगता है। कोटितीर्थमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन करनेवाला मनुष्य कहीं भी ब्रह्महत्या आदि पापोंसे लिप्त नहीं होता। महान् अपवित्र स्थानमें जानेवाले अज्ञानी जीव भी यदि भगवान्‌के चरणोंसे प्रकट हुई गंगाका जल पी लें तो उनका सब पाप नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य सूर्योदयकालमें वेदवती नदीमें स्नान करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो उत्तम सुखका भागी होता है। रघुनन्दन! प्रायः सभी तीर्थ स्नान, जलपान तथा गोता लगानेसे अनायास ही मनुष्योंके सब पापोंका नाश कर देते हैं। सब तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ धर्मारण्य बतलाया जाता है; क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने पूर्वकालमें सबसे पहले इसी तीर्थको स्थापित किया था। सब वनों और तीर्थोंमें विशेषतः धर्मारण्यसे बढ़कर भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला दूसरा कोई तीर्थ नहीं है। स्वर्गके देवता भी धर्मारण्यनिवासी मनुष्योंकी सराहना करते हैं।

रघुनन्दन! द्वारका, काशी, त्रिशूलधारी शिव तथा भैरव—ये सब जैसे मुक्तिदायक हैं, उसी प्रकार धर्मारण्य भी मोक्ष देनेवाला उत्तम तीर्थ है। यह सुनकर महाधनुर्धर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सीतादेवी और अपने भाइयोंके साथ तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान किया। उनके पीछे कपीश्वर हनुमान्‌जी, माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी, लक्ष्मण, भरत, सेनासहित शत्रुघ्न, अयोध्याके अन्यान्य निवासी तथा प्रजावर्गके लोग भी गये। तीर्थयात्राकी विधिका पालन करनेके लिये घरसे चले हुए राजा श्रीरामने अपने कुलके आचार्य महर्षि वसिष्ठसे कहा—'मुने! यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि आदिमें यह धर्मारण्य क्षेत्र हुआ या द्वारका हुई। धर्मारण्य क्षेत्रकी उत्पत्ति कितने कालसे हुई है, यह बताइये।'

वसिष्ठजी बोले—महाराज! मैं नहीं जानता कि यह क्षेत्र कितने दिनोंसे प्रकट है। दीर्घजीवी लोमश और जाम्बवान् इसका कारण जानते होंगे। शरीरमें जो अनेक जन्म-जन्मान्तरोंका किया हुआ पाप संचित है, उन सभी पापोंका उत्तम प्रायश्चित्त यह धर्मारण्य क्षेत्र माना गया है।

वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने वहाँ जानेका विचार करके यात्रा-विधिका पालन किया। फिर वसिष्ठजीको आगे करके महामाण्डलिक राजाओं (सामन्तों)-के साथ पुरश्चरणविधि पूर्ण कर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। आगे जाकर फिर वे पश्चिम दिशाकी ओर मुड़ गये। गाँव-से-गाँव, देश-से-देश और वन-से-वनको लाँघते हुए आगे बढ़ते चले गये। सेना, सामान, हजारों हाथी, घोड़े, करोड़ों रथ आदि वाहनों और असंख्य शिविकाओंके साथ श्रीरघुनाथजी

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