भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 669

६४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नहीं आ रहे हैं। बारह वर्ष बीत गये, यहाँका प्रत्येक घर अनाथकी भाँति सूनसान पड़ा है। जिस बावलीमें स्नान और दानके लिये उद्यत मनुष्योंकी भीड़ लगती थी, उसीमें अब सूअर कूदते हैं। जहाँ ब्राह्मणलोग निरन्तर सामवेदका गान करते थे, वहाँ अब सियारिनोंके अत्यन्त भयंकर शब्द सुनायी देते हैं। जहाँ घर-घरमें अग्निहोत्रका धूम दृष्टिगोचर होता था, वहीं अत्यन्त भयंकर दावानल धूएँके साथ दिखायी देता है। जिस सभामण्डपमें मन्त्रजप करनेवाले ब्राह्मण बैठा करते थे, वहीं अब गवय, रीछ और स्याही आदि जीव बैठते हैं। यहाँ जो ऊँची-ऊँची यज्ञकी चौकोर वेदियाँ बनी थीं, वे अब बाँबीकी मिट्टीके ढेरसे घिरी दिखायी देती हैं। नृपश्रेष्ठ श्रीराम! अब मेरा निवास-स्थान इस दशाको पहुँच गया है। यहाँसे जो ब्राह्मण चले गये, इसका मुझे बहुत दुःख है। नरेश्वर! मुझे इस संकटपूर्ण अवस्थासे उबारिये।'

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बोले—'आपके ब्राह्मण चारों दिशाओंमें चले गये हैं। मैं न तो उनकी संख्या जानता हूँ और न उनके नाम-गोत्रसे ही मेरा परिचय है। अतः उनकी जाति और गोत्रके विषयमें आप यथार्थ रूपसे बताइये, जिससे उन सबको यहाँ ले आकर मैं अपने-अपने स्थानपर बसाऊँ।'

श्रीमाता बोली—नरेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु और शिवने जिन्हें यहाँ स्थापित किया था, वे वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण अठारह हजारकी संख्यामें यहाँ रहते थे। तीनों वेदोंकी विद्यामें उनकी बड़ी ख्याति है। वे प्रतिष्ठित ब्राह्मण चौंसठ गोत्रोंके हैं। उनके साथ छत्तीस हजार वैश्य थे, जो धर्मपरायण, सदाचारी और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहनेवाले थे। जहाँ संज्ञारानीके साथ राजा वकुलादित्य नामसे विख्यात भगवान् सूर्य विराजते हैं; जहाँ दोनों अश्विनीकुमार हैं, जहाँ व्ययकी पूर्ति करनेवाले साक्षात् कुबेर हैं, वही यह धर्मारण्य क्षेत्र है, जिसकी अधिष्ठातृदेवी मैं मानी गयी हूँ। मैं यहाँकी भट्टारिका (स्वामिनी) हूँ।

श्रीसूतजी कहते हैं—उस स्थानके जो आचार और वहाँ रहनेवालोंके जो कुलाचार थे, उन सब प्राचीन वृत्तान्तोंको श्रीमाताने श्रीरामचन्द्रजीके आगे निवेदन किया। उसकी बात सुनकर रघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा—'आपने मुझसे सत्य-सत्य बातें बतायी हैं। अतः मैं इसी नामसे यहाँ नगर बसाऊँगा। यह नगर तीनों लोकोंमें उत्तम सत्यमन्दिरके नामसे विख्यात होगा।' यों कहकर श्रीरामचन्द्रजीने अपने एक लाख सेवकोंको ब्राह्मणोंको बुला लानेके लिये भेजा और कहा—'जिस देश, प्रदेश, नदी, तट, वन अथवा ग्राममें जहाँ-जहाँ धर्मारण्यनिवासी ब्राह्मण गये हों, वहाँ-वहाँसे अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें तुमलोग शीघ्र यहाँ बुला लाओ। मैं तभी यहाँ भोजन करूँगा, जब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके दर्शन कर लूँगा।'

भगवान्‌का यह आदेश सुनकर उनके आज्ञापालक दूत सब दिशाओंमें चले गये। उन्होंने सब ब्राह्मणोंको खोज निकाला और उन्हें पाकर सब-के-सब बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शास्त्रोक्त विधानसे अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा उन सबका पूजन किया, स्तुति की और विनययुक्त बर्ताव करते हुए श्रीरामचन्द्रजीका अनुरोध सुनाकर उन सबको धर्मारण्य चलनेके लिये आमन्त्रित किया। तदनन्तर वे सभी वेद-शास्त्रपरायण ब्राह्मण सेवकोंके साथ वहाँ जानेको उद्यत हुए और बड़े आदरपूर्वक श्रीरामके समीप गये। उन्हें देखकर दशरथनन्दन महाराज रामके अंगोंमें हर्षसे रोमांच हो आया और उन्होंने अपनेको कृतार्थ-सा माना। वे बड़े वेगसे उठकर पैदल ही उनकी अगवानीके लिये