भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 678
  • ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६४९

महान् फल देनेवाला होता है। जन्मकालमें जिससे यह शरीर पुष्ट हुआ है, उस अन्न एवं दुग्धका दान उत्तम है। साग देनेवाला मनुष्य न कभी नरकमें जाता है और न यमलोकका दर्शन करता है। वस्त्र देनेवाला प्रलयकालतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। जो चातुर्मास्यमें चन्दन, अगुरु और धूपका दान करता है, वह मनुष्य पुत्र-पौत्रोंसहित विष्णुरूप होता है। भगवान् विष्णुके शयनकालमें जो मनुष्य वेदवेत्ता ब्राह्मणको फल दान करता है, वह यमलोकको नहीं देखता। जो चौमासेमें भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये विद्यादान, गोदान और भूमिदान करता है, वह अपने पूर्वजोंका उद्धार कर देता है। जो जिस देवताके उद्देश्यसे चौमासेमें गुड़, नमक, तेल, शहद, तिक्त पदार्थ, तिल और अन्न देता है, वह उसीके लोकमें जाता है। विशेषतः चातुर्मास्यमें मनुष्यको अग्निमें आहुति देनी चाहिये, ब्राह्मणको दान देना चाहिये और गौओंकी भलीभाँति सेवा-पूजा करनी चाहिये। भविष्यमें दान देनेकी प्रतिज्ञा न करके शीघ्र ही दे डालना चाहिये। मनुष्य जो कुछ देनेकी इच्छा करे, वह अवश्य दे डाले। जिसको देनेका निश्चय किया हो उसे ही दे, दूसरेको न दे। दी हुई वस्तु उससे वापस न ले। जो श्रीहरिके शयनकालमें ब्राह्मणोंके लिये सब प्रकारका दान देता है, वह पूर्वजोंसहित अपनेको पापोंसे मुक्त कर लेता है।


चातुर्मास्यमें इष्ट वस्तुके परित्याग तथा नियम-पालनका महत्त्व

ब्रह्माजी कहते हैं—मनुष्य सदा प्रिय वस्तुकी इच्छा करता है। अतः जो चातुर्मास्यमें भगवान् नारायणकी प्रीतिके लिये अपने प्रिय भोगोंका पूर्ण प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षयरूपमें प्राप्त होती हैं। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक प्रिय वस्तुका त्याग करता है, वह अनन्त फलका भागी होता है। धातुपात्रोंका त्याग करके पलाशके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। गृहस्थ मनुष्य ताँबेके पात्रमें कदापि भोजन न करे। चौमासेमें तो ताँबेके पात्रमें भोजन विशेषरूपसे त्याज्य है। मदारके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य अनुपम फलको पाता है। चातुर्मास्यमें विशेषतः वटके पत्रमें भोजन करना चाहिये। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये गृहस्थ-आश्रमका परित्याग करके बाह्य आश्रमका सेवन करनेवाले मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता। मिर्च छोड़नेसे राजा होता है, रेशमी वस्त्रोंके त्यागसे अक्षय सुख मिलता है, उड़द और चना छोड़ देनेसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती। चातुर्मास्यमें विशेषतः काले रंगका वस्त्र त्याग देना चाहिये। नीले वस्त्रको देख लेनेसे जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यनारायणके दर्शनसे होती है। कुसुम्भ रंगके परित्याग करनेसे मनुष्य यमराजको नहीं देखता। केशरके त्यागसे वह राजाका प्रिय होता है। फूलोंको छोड़नेसे मनुष्य ज्ञानी होता है, शय्याका परित्याग करनेसे महान् सुखकी प्राप्ति होती है। असत्यभाषणके त्यागसे मोक्षका दरवाजा खुल जाता है। चातुर्मास्यमें परनिन्दाका विशेषरूपसे परित्याग करे। पर-निन्दा महान् पाप है, पर-निन्दा महान् भय है, पर-निन्दा महान् दुःख है और पर-निन्दासे बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है*। पर-निन्दाको सुननेवाला भी पापी होता है। चौमासेमें केशोंका संँवारना (हजामत)


* परनिन्दा महापापं परनिन्दा महाभयम्। परनिन्दा महद्दुःखं न तस्याः पातकं परम् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ४। २५)