संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 708, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७९
आँखें खोलीं और देखा—उसका वही निवासस्थान परम सुन्दर शिवालय हो गया था। मणियोंके खम्भे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके द्वार, किवाड़ तथा सदर फाटक सब सुवर्णमय हो गये थे। वहाँकी भूमि बहुमूल्य नीलमणि तथा हीरोंकी वेदिकाओंसे सुशोभित थी। यह सब देखकर वह सहसा उठा और हर्षसे परमानन्दके समुद्रमें निमग्न-सा हो गया। उसने समझ लिया कि यह सब शिवजीकी पूजाका माहात्म्य है। उसीके प्रभावसे यह दिव्य विभूति प्रकट हुई है। तत्पश्चात् उस बालकने अपनी माताके अपराधकी शान्तिके लिये पृथ्वीपर मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'देव! उमापते! मेरी माताका अपराध क्षमा कीजिये। वह मूढ़ है, आपके प्रभावको नहीं जानती है। शंकर! आप उसपर प्रसन्न होइये, यदि मुझमें आपकी भक्तिसे उत्पन्न हुआ कुछ भी पुण्य है, तो उससे मेरी माता आपकी दया प्राप्त करे।'
इस प्रकार भगवान् शंकरको बार-बार प्रसन्न करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर सूर्यास्तके समय वह बालक शिवालयसे बाहर निकला और उसने अपने शिविरको देखा। वह इन्द्रनगरके समान शोभा पा रहा था। वहाँ सब कुछ तत्काल सुवर्णमय होकर विचित्र वैभवसे प्रकाशित होने लगा। भवनके भीतर प्रवेश करके बालकने देखा, उसकी माँ बहुमूल्य रत्नमय पलंगपर बिछी हुई श्वेत रंगकी शय्यापर निर्भय होकर सो रही है और उसीको याद करती है। उसने माताको जगाया। ग्वालिन बड़े वेगसे उठी और अपनेको, अपने पुत्रको तथा अपने घरको भी अपूर्व रूपमें देखकर आनन्दसे विह्वल हो गयी। पुत्रके मुखसे गिरिजापति शंकरका वह सब प्रसाद सुनकर ग्वालिनने राजाको सूचना दी, जो निरन्तर भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते थे। राजा अपना नियम पूरा करके रातमें सहसा वहाँ आये और ग्वालिनके पुत्रका वह प्रभाव, जो शंकरजीके सन्तोषसे प्रकट हुआ था, देखा। सुवर्णमय शिव-मन्दिर, रत्नमय शिवलिंग तथा सुन्दर मणि-माणिक्योंसे जगमगाता हुआ ग्वालिनका महल देखकर राजा चन्द्रसेन पुरोहित और मन्त्रियोंके साथ दो घड़ीतक आश्चर्य-चकित हो परमानन्दमें डूबे रहे। तत्पश्चात् उन्होंने नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाते हुए ग्वालिनके उस बालकको हृदयसे लगा लिया। भगवान् शिवके इस अद्भुत माहात्म्यकी चर्चा समस्त पुरवासियोंमें बड़े वेगसे फैली और यही कहते-सुनते वह रात मानो क्षणभरमें व्यतीत हो गयी।
युद्धके लिये आये हुए और नगरको चारों ओरसे घेरकर खड़े हुए राजाओंने भी प्रातःकाल दूतोंके मुखसे यह परम अद्भुत समाचार सुना। सुनते ही उनके मनसे वैरभाव निकल गया। उन्होंने सहसा हथियार डाल दिये और चकित होकर महाराज चन्द्रसेनकी आज्ञासे नगरमें प्रवेश किया। उस रमणीय नगरीमें प्रवेश करके भगवान् महाकालको प्रणाम करनेके पश्चात् सब राजा उस ग्वालिनके घरपर आये। वहाँ राजा चन्द्रसेनने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। वे बहुमूल्य आसनोंपर बैठे और प्रीतिपूर्वक विस्मित एवं आनन्दित हुए। गोप-बालकपर कृपा करनेके लिये स्वतः प्रकट हुए शिवालय और शिवलिंगका दर्शन करके सब राजाओंने भगवान् शिवको अपनी उत्तम बुद्धि समर्पित की, उनमें भक्तिपूर्वक मन लगाया।
इसी समय सब देवताओंसे पूजित परम तेजस्वी वानरराज हनुमान्जी वहाँ प्रकट हुए। उनके आते ही सब राजाओंने बड़े वेगसे उठकर भक्तिभावसे विनीत हो उन्हें नमस्कार किया। तब हनुमान्जीने कहा—'राजाओ! भगवान् शिवकी पूजाके सिवा देहधारियोंके लिये दूसरी कोई गति नहीं है। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस गोप-बालकने शनिवारको प्रदोषव्रतके दिन बिना