संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सखा हुआ। राजकुमार और वैश्यकुमार दोनों परस्पर बड़ा स्नेह रखते थे। वैश्यराजने विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा राजकुमार और अपने पुत्रका भी संस्कार विस्तारपूर्वक करवाया। समयपर उपनयन-संस्कार हो जानेके पश्चात् दोनों बालकोंने गुरुसेवामें तत्पर हो विनयपूर्वक सम्पूर्ण विद्याओंका संग्रह किया। तदनन्तर जब राजकुमारका सोलहवाँ वर्ष लगा, तब वे ही ऋषभ योगी पुनः वैश्यराजके घर आये। रानी और राजकुमारने बड़े हर्षके साथ उनको बार-बार प्रणाम करके उनकी यथायोग्य पूजा की। उन दोनोंसे पूजित होनेपर योगीश्वर शिवयोगीने कहा—'बेटा! तुम कुशलसे तो हो न? तुम्हारी माताको भी कोई कष्ट तो नहीं है? क्या तुमने सब विद्याओंका अध्ययन कर लिया? गुरुजनोंकी सेवामें सदा संलग्न रहते हो न? वत्स! क्या मुझ प्राणदाता गुरुका कभी स्मरण करते हो?'
योगीश्वर ऋषभके ऐसा कहते समय विनयशीला रानीने अपने पुत्रको उनके चरणोंमें डाल दिया और कहा—गुरुदेव! यह आपका ही पुत्र है। आप ही इसके प्राणदाता पिता हैं। आप दया करके अपने इस शिष्यको अनुगृहीत करें और इसे सत्पुरुषोंके उत्तम मार्ग—शुभ कर्मका उपदेश दें। रानीके द्वारा इस प्रकार प्रसन्न कराये जानेपर परम बुद्धिमान् शिवयोगीने राजकुमारको सन्मार्गका उपदेश दिया।
ऋषभ बोले—वेद, स्मृति और पुराणोंमें जिसका उपदेश किया गया है, वही सनातन धर्म है। सब लोगोंको चाहिये कि अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार सदा शास्त्रोक्त धर्मका सेवन करें। वत्स! तुम सदा सत्पुरुषोंके मार्गपर चलो। उत्तम आचारका ही पालन करो। देवताओंकी आज्ञाका कभी उल्लंघन न करो, देवताओंकी अवहेलना भी न करो। गौ, देवता, गुरु और ब्राह्मणके प्रति सदा भक्तिभाव रखो। अतिथिके रूपमें चाण्डाल भी अपने घर आ जाय, तो सदा उसका सत्कार करो। अपने प्राणोंपर संकट आ जाय तो भी सत्यका परित्याग न करो। महाबाहो! पराये धनकी, परायी स्त्रीकी, देवता तथा ब्राह्मणकी वस्तुओंकी और अत्यन्त दुर्लभ पदार्थोंकी भी तृष्णा त्याग दो। महामते! सदा उत्तम कथा, उत्तम आचार, उत्तम व्रत, सत्पुरुषोंके आगमन तथा धर्म आदिके संग्रहकी ही अभिलाषा करो। स्नान, जप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण, गोपूजा, देवपूजा और अतिथिपूजामें कभी आलस्यको समीप न आने दो। क्रोध, द्वेष, भय, शठता, चुगली, अनुचित आग्रह, कुटिलता, दम्भ और उद्वेगका यत्नपूर्वक त्याग करो। अकारण वैर, व्यर्थकी बकवाद और दूसरोंकी निन्दा छोड़ दो। मृगया, द्यूतक्रीडा, मद्यपान, स्त्री और स्त्रीलम्पट पुरुष—इन सबके संगका परित्याग करो। अधिक भोजन, अधिक परिश्रम, अधिक बातचीत और अधिक खेल-कूद तथा क्रीडा-विलासको सदाके लिये छोड़ दो। अधिक विद्या, अधिक श्रद्धा, अधिक पुण्य, अधिक स्मरण, अधिक उत्साह, अधिक प्रसिद्धि और अधिक धैर्य जैसे भी प्राप्त