भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 745, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 745

७१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उसकी यह बात सुनकर श्रेष्ठ ब्राह्मण हँसकर बोले—देवि! तुम्हारा पति तो पाणिग्रहणमात्र करके मर गया। फिर इस पुत्रका जन्म कैसे हुआ, इसका कारण बताओ।

शारदा बोली—महामते! परिहाससे कोई लाभ नहीं! आप मुझे जानते हैं और मैं आपको जानती हूँ। इस विषयमें हम दोनोंके मन ही प्रमाण है।

ऐसा कहकर उसने देवीके दिये हुए वरदान आदिकी बातें बतायीं और अपने व्रतके आधे भाग व्रतधारी कुमार शारदेयको उन्हें सौंप दिया। वे ब्राह्मण देवता बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कुमारको हृदयसे लगा लिया और शारदाके माता-पिताकी आज्ञा लेकर शारदा तथा उस बालकको अपने घर बुला ले गये। ब्राह्मणके घरमें शारदाने कई मास व्यतीत किये। जब उनकी मृत्यु हो गयी, तब उन्हींके साथ चिताकी अग्निमें प्रवेश करके उसने उनका अनुसरण किया। फिर भी दोनों दिव्य दम्पति होकर दिव्य विमानपर बैठे और भगवान् शिवके लोकमें चले गये। इस प्रकार मैंने यह पवित्र उपाख्यान सुनाया, जो पढ़ने और सुननेवालोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

प्रतिदिन भगवत्सम्बन्धी उत्तम कथाके श्रवणसे मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है। पुण्यक्षेत्रमें निवास करनेसे चित्त शुद्ध होता है। उत्तम कथाके सुननेसे मनुष्य जिस प्रकार उत्तम गतिको पाता है, उस प्रकार अन्य उत्तम व्रतोंसे नहीं। अन्य व्रतोंसे उसकी बुद्धि वैसी उत्तम नहीं होती। जैसे बार-बार शोधन करनेपर दर्पण निर्मल होता है, वैसे ही सत्कथाश्रवणसे चित्त अधिकाधिक शुद्ध होता है। चित्त शुद्ध होनेपर मनुष्योंके द्वारा शिवजीका ध्यान सिद्ध होता है। ध्यानसे पुण्यात्मा पुरुष मन, वाणी और शरीरद्वारा संचित समस्त पापराशिको धोकर भगवान् शिवके परम पदको प्राप्त होते हैं। अतः जिन्होंने अपना पुण्य भगवान् शिवके चरणोंमें समर्पित कर दिया है, उन लोगोंके लिये भगवान् शिवकी उत्तम कथाका श्रवण-कीर्तन ही सर्वोत्तम साधन है; क्योंकि कथासे ध्यान सिद्ध होता है और ध्यानसे कैवल्यकी प्राप्ति होती है।

मुनिवरो! आप सब लोग बड़े सौभाग्यशाली हैं। आपका ही जीवन सफल है; क्योंकि आपलोग सदा भगवान् शिवके उत्तम कथामृत-रसका सेवन करते हैं। इस जीव-जगत्में वस्तुतः उन्हींका जन्म सफल है, जिनका मन सदा भगवान् विश्वनाथका ध्यान करता है, वाणी उनके गुण गाती है और दोनों कान उन्हींकी कथा सुनते हैं। ऐसे ही लोग इस संसार-सागरको पार करते हैं। नाना प्रकारके गुणविभेद जिनके स्वरूपका कभी स्पर्श नहीं करते, जो अपनी महिमासे जगत्के बाहर और भीतर समान रूपसे व्याप्त हैं, जो अपने ही प्रकाशमें विहार करते हैं और जो मन-वाणीकी वृत्तियोंसे बहुत दूर हैं, मैं उन अनन्तानन्दघनस्वरूप परम शिवकी शरण लेता हूँ।

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ब्रह्मोत्तर-खण्ड सम्पूर्ण।

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ब्राह्म-खण्ड समाप्त

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