भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 747
७९८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सुदिन है; पूर्वजन्मोंके किये हुए मेरे चिरसंचित पुण्य आज ही फलीभूत हुए हैं।'

विन्ध्यगिरिकी यह बात सुनकर नारदजी कुछ लंबी साँस खींचकर रह गये। तब सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यने कहा—'सब अर्थोंके ज्ञाता विप्रवर ! मुझे अपने उच्छ्वासका कारण बताइये।' नारदजीने मन-ही-मन सोचा—बढ़ते हुए अभिमानका संसर्ग किसीके लिये बड़प्पनका कारण नहीं है। अतः आज विन्ध्यगिरिका बल देखना चाहिये। यों सोचकर मुनि बोले—'पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुगिरि तुम्हारा अपमान करता है, इसीलिये मैंने लंबी साँस खींची है और यह बात तुमसे बता दी है। तुम्हारा कल्याण हो।' ऐसा कहकर नारद मुनि आकाशमार्गसे चले गये। मुनिके जाते ही विन्ध्याचल अत्यन्त उद्विग्नचित्त हो बड़ी चिन्तामें पड़ गया और मन-ही-मन कहने लगा—'जिसने शास्त्रका एक अंश भी नहीं पढ़ा है, उसके जीवनको धिक्कार है। जो उद्योगहीन है, उसके जीनेको भी धिक्कार है और जिसका मनोरथ पूर्ण नहीं होता, उसके जीनेको भी धिक्कार है। पुरानी बातोंको जाननेवाले विद्वान् पुरुषोंने यह ठीक ही कहा है कि चिन्ताका स्वरूप बड़ा भयंकर है। चिन्ता न तो औषधोंसे शान्त होती है और न दूसरे किसी उपायसे। चिन्तारूपी ज्वर मनुष्योंकी भूख, नींद और बल हर लेता है। रूप, उत्साह, बुद्धि, सम्पत्ति और जीवनको भी नष्ट कर देता है। ज्वर छः दिन व्यतीत होनेपर जीर्णज्वर कहलाता है, किंतु तीव्र चिन्ताज्वर प्रतिदिन नूतनताको प्राप्त होता है *। इसे दूर करनेमें धन्वन्तरि भी धन्यवादके पात्र नहीं हो पाते। इसमें चरक भी विचरण नहीं कर सकते। इतना ही नहीं, नासत्य (दोनों अश्विनीकुमार) भी इसमें सत्य नहीं हो पाते। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कैसे मेरुपर्वतको परास्त करूँ। यहाँ उचित और अनुचितके विचारका कोई उपयोग नहीं है, अथवा इन व्यर्थकी चिन्ताओंसे क्या लाभ? मैं विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् विश्वनाथकी ही शरणमें चलूँ। वे ही मुझे बुद्धि प्रदान करेंगे। ग्रह, नक्षत्र और तारागणोंके साथ भगवान् सूर्य मेरुको अधिक बलवान् मानकर प्रतिदिन उसकी प्रदक्षिणा करते हैं।'

ये ही सब बातें सोचकर विन्ध्यगिरि ऊँचाईकी ओर बढ़ने लगा, मानो वह अपने शिखरोंसे अनन्त आकाशका अन्त कर देना चाहता हो। गिरिराज विन्ध्य सूर्यका मार्ग रोककर ही कुछ स्वस्थ-सा हुआ।

तदनन्तर अन्धकारका नाश करनेवाले भगवान् सूर्य उदयाचल पर्वतपर उदित हुए और क्रमशः दक्षिण दिशाकी ओर चले। किंतु जब उनके घोड़े आगे न बढ़ सके, तब अनूरु (अरुण) नामक सारथिने सूचित किया—'भानुदेव! अभिमानसे ऊँचे उठा हुआ यह विन्ध्यपर्वत आकाशका मार्ग रोककर खड़ा है। आप जो मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, उसके कारण यह गिरिराज मेरुसे लाग-डाँट रखता है।' अनूरुकी बात सुनकर भगवान् सूर्यने मन-ही-मन सोचा—'अहो! आकाशका मार्ग भी रोका जाता है। यह बड़े विस्मयकी बात है।' जो आधे पलमें दो हजार दो सौ दो योजन चलते हैं, वे सूर्य भी दैववश एक ही जगह अधिक समयतक रुके रह गये। इस प्रकार दीर्घकालतक प्रचण्डरश्मि सूर्यके ठहर जानेसे पूर्व और उत्तर दिशामें रहनेवाले जीव उनकी किरणोंके तापसे सन्तप्त हो बहुत व्याकुल हो गये। दक्षिण और पश्चिमके लोग लेटे हुए ही ग्रह तथा नक्षत्रोंसहित आकाशको देखने लगे। वे सोचते थे 'सूर्यका दर्शन नहीं हुआ, इसलिये यह दिन नहीं है और रात भी नहीं है; क्योंकि चन्द्रमा अस्त हो गये। आकाशके तारे भी लुप्त होते जाते हैं। अतः यह कौन-सा समय है, इसका पता नहीं चलता।' पृथ्वीपर स्वाहा (देवयज्ञ), स्वधा (पितृयज्ञ) और


* चिन्ताज्वरो मनुष्याणां क्षुधां निद्रां बलं हरेत्। रूपमुत्साहबुद्धिं श्रीं जीवितं च न संशयः॥
ज्वरो व्यतीते षडहे जीर्णज्वर इहोच्यते। असौ चिन्ताज्वरस्तीव्रः प्रत्यहं नवतां व्रजेत्॥
(स्क० पु०, का० पू० १।६९-७०)