भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 754

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७२५

स्तुति करके पत्नीसहित अगस्त्य मुनिने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।

लक्ष्मीजीने कहा—मित्रावरुणनन्दन अगस्त्य! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो। उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली पतिव्रते लोपामुद्रे! तुम भी उठो। मैं इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मनोवांछित वर माँगो।

यों कहकर विष्णुप्रिया श्रीलक्ष्मीजीने मुनिपत्नी लोपामुद्राको हृदयसे लगा लिया और प्रेमपूर्वक अनेक प्रकारके सौभाग्यसूचक आभूषणोंसे उन्हें विभूषित किया। तत्पश्चात् वे पुनः बोलीं—'मुने! मैं तुम्हारे आन्तरिक तापका कारण जानती हूँ।' यह सुनकर महाभाग मुनिवर अगस्त्यजीने लक्ष्मीदेवीको प्रणाम करके भक्तिसे भरा हुआ वचन कहा—'देवि! यदि मैं वर देनेयोग्य होऊँ तो आप मेरे लिये यही वर प्रदान करें कि मुझे पुनः काशीकी प्राप्ति हो। मेरे द्वारा की हुई आपकी इस स्तुतिका जो सदा भक्तिपूर्वक पाठ करें, उन्हें कभी सन्ताप और दरिद्रता न हो।'

लक्ष्मीजीने कहा—मुने! 'एवमस्तु'। तुमने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा। इस स्तोत्रका पाठ मेरे सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला होगा। मुनीश्वर! आनेवाले उनतीसवें द्वापरमें तुम व्यास होओगे। उस समय काशीमें आकर वेदों-पुराणोंका विस्तार करके सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश देकर तुम मनोवांछित सिद्धि प्राप्त करोगे। इस समय मैं तुम्हारे हितकी एक बात बतलाती हूँ, उसका पालन करो। यहाँसे कुछ ही दूरीपर जाकर अपने सामने खड़े हुए स्वामिकार्तिकेयका दर्शन करो। ब्रह्मन्! वे तुम्हें काशीका यथार्थ रहस्य बतलायेंगे।

इस प्रकार वरदान पाकर महालक्ष्मीको प्रणाम करके मुनिवर अगस्त्य उस स्थानपर गये, जहाँ श्रीकार्तिकेयजी विराजमान हैं।


मुक्तिदायक तीर्थोंका वर्णन तथा मानसतीर्थ एवं काशीकी श्रेष्ठता

श्रीव्यासजी कहते हैं—सूत! जिन सत्पुरुषोंके हृदयमें परोपकारकी भावना जाग्रत् रहती है, उनकी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उन्हें पग-पगपर सम्पत्ति प्राप्त होती है। उपकारके द्वारा जैसे पुण्य-फलकी प्राप्ति होती है, तीर्थोंमें स्नान करनेसे भी वैसी शुद्धि नहीं होती, बहुतेरे दान देनेसे भी वह फल नहीं मिलता और कठोर तपस्याओंसे भी उस पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती। परोपकारसे जो धर्म होता है तथा दान आदि सत्कर्मोंसे जिस धर्मकी प्राप्ति होती है, उन दोनोंको ब्रह्माजीने तौला था। उस समय परोपकारजनित धर्मका ही पलड़ा भारी रहा। सम्पूर्ण वाङ्मय (शास्त्र)-का मन्थन करके यही निर्णय किया गया है कि उपकारसे बढ़कर कोई धर्म नहीं और अपकारसे बढ़कर कोई पाप नहीं है। परोपकारजनित पुण्यके प्रभावसे ही साक्षात् महालक्ष्मीका दर्शन करके मुनिवर अगस्त्य कृतार्थ हो गये। वहाँसे आगे बढ़नेपर मुनिने श्रीपर्वतको