संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उन्होंने सेवकोंको भी साथ ही ले लिया था। नर्मदा नदीके तटपर भृगुकच्छ नामसे प्रसिद्ध जो महान् तीर्थ है, वहाँ पहुँचकर दैत्यराजने सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर अपने अधिकारमें किया। तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा ले अनेक अश्वमेध यज्ञोंद्वारा उन्होंने बड़ी भक्तिके साथ भगवान्का आराधन किया। विरोचनपुत्र बलि सत्यवादियोंमें सबसे श्रेष्ठ थे। उन्होंने ब्रह्मा और आचार्यका वरण करके सोलह ऋत्विजोंका भी वरण किया। फिर महात्मा शुक्रने भलीभाँति परीक्षा लेकर बलिको यज्ञकी दीक्षा दी और उनके द्वारा निन्यानबे यज्ञोंका अनुष्ठान करवाया। तत्पश्चात् बलिने अन्तिम अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करनेका विचार किया। जबतक उनके सौ यज्ञ पूरे हों, उसके पहले मैं पूर्वोक्त प्रसंग बतला देना चाहता हूँ। पहले कहा जा चुका है कि अदिति देवीने उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया और उस व्रतसे सन्तुष्ट होकर भगवान् श्रीहरि वामन ब्रह्मचारीके रूपमें उनके पुत्र होकर प्रकट हुए। परमेष्ठी ब्रह्माने आकर उन्हें यज्ञोपवीत दिया। महात्मा चन्द्रमाने दण्डकाष्ठ प्रदान किया। परम अद्भुत मृगचर्म और मेखला मँगायी गयी। पृथ्वी देवीने उन्हें चरणपादुका भेंट की। इसी तरह और लोगोंने भी वटुरूपधारी भगवान् विष्णुको अन्य आवश्यक वस्तुएँ अर्पित कीं।
तदनन्तर कश्यप और अदितिको प्रणाम करके महातेजस्वी वामनजी यजमान बलिकी यज्ञशालामें गये। उस समय सुरेश्वरगण उन वेदान्तवेद्य श्रीविष्णुकी महिमाका गान कर रहे थे। अनेक प्रकारके रूप और वेष धारण करनेवाले भगवान्ने उस यज्ञमें पहुँचकर सामवेदकी ऋचाओंका विधिपूर्वक गान किया। सामगानके अनन्तर वे इस प्रकार बोले—'राजन्! दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लादजी हुए जो बड़े तेजस्वी, जितेन्द्रिय तथा विष्णुभक्त हैं; जिन्होंने दैत्यराजकी सभामें अतिशय तेजस्वी भगवान् नृसिंहको प्रकट किया था। महाभाग! उन्हीं प्रह्लादजीके पुत्र तुम्हारे पिताजी थे, जो संसारमें विरोचनके नामसे विख्यात हुए थे। उन महात्माने स्वयं ही अपना मस्तक दान करके इन्द्रको सन्तुष्ट किया था। राजन्! तुम उन्हीं महात्मा विरोचनके पुत्र हो। तुमने बड़े उत्तम यशका विस्तार किया है। तुम्हारे यशरूपी महान् दीपककी ज्योतिमें सम्पूर्ण देवता पतंगोंके समान दग्ध हो गये हैं। तुमने इन्द्रको भी जीत लिया है, इसमें संशय नहीं है। सुव्रत! मैं तुम्हारे सब चरित सुन चुका हूँ। तुम बड़े मनस्वी हो तथा तीनों लोकोंमें अधिक-से-अधिक दान करनेवाले दाताके रूपमें तुम्हारी ख्याति है। तथापि मेरे लिये तुम्हें तीन पग पृथ्वी देनी चाहिये।' तब विरोचनकुमार बलिने हँसकर कहा—'महाभाग! मैं पर्वत, बड़े-बड़े जंगल तथा सम्पूर्ण द्वीपोंसहित समूची पृथ्वी तुम्हें दूँगा, तुम मेरी दी हुई इस भूमिको ग्रहण करो।' वामनजीने कहा—'दैत्यराज! स्वयं चलते समय मेरे तीन पगोंसे जितनी पृथ्वी मापी जाय, उतनी ही मुझे दीजिये।' ब्रह्मचारीकी बात सुनकर बलिने हँसते हुए कहा—'बहुत अच्छा, लीजिये।' यों कहकर बलिने कश्यपकुमार वामनजीका भलीभाँति पूजन किया। उस समय बड़े-बड़े ऋषि तथा मुनीश्वर महातेजस्वी बलिके सौभाग्यकी सराहना कर रहे थे। वामनजीका पूजन करके राजा बलि ज्यों ही उन्हें दान देनेको उद्यत हुए त्यों ही शुक्राचार्यने उन्हें रोक दिया और कहा—'दैत्यराज! ब्रह्मचारीके रूपमें ये साक्षात् विष्णु हैं। इन्हें तुम दान न देना। ये तो इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये आये हैं और तुरंत तुम्हारे यज्ञमें विघ्न डाल रहे हैं। अतः अध्यात्मतत्त्वका प्रकाश करनेवाले ये विष्णु तुम्हारे द्वारा इस समय पूजा पानेके योग्य नहीं हैं। इन्होंने ही पहले मोहिनीरूप धारण किया था। उस समय देवताओंको तो अमृत पिलाया और राहुको मार डाला। इन्होंने ही दैत्योंका संहार किया है और महाबली कालनेमि भी इन्हींके हाथों मारा गया है। ये ही ईश्वर हैं और ये ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। महामते!