संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 772, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४३
होते हैं, वे इस लोकमें श्रेष्ठतम होकर निवास करते हैं।
पूर्वकालमें विन्ध्याचलके जंगलोंमें पिंगाक्ष नामसे प्रसिद्ध एक भील रहता था, जो भीलोंका सरदार था। निर्विन्ध्या नदीके तटपर उसका घर था। वह शूरवीर होनेके साथ ही क्रूरकर्मोंसे विमुख था। पथिकोंपर डाका डालनेवाले लुटेरोंको वह दूर रहकर भी मरवा डालता था और व्याघ्र आदि दुष्ट एवं हिंसक जीवोंको प्रयत्नपूर्वक मारता था। यद्यपि व्याधोंके आचार-व्यवहारसे ही उसकी जीविका चलती थी तथापि उस दशामें भी वह जीवोंके प्रति बड़ा दयालु था। वह थके-माँदे बटोहियोंको विश्राम देता, भूखोंको भोजन देकर उनकी भूख मिटाता और नंगे पाँववाले मनुष्योंको जूता देता था। जिनके पास वस्त्र नहीं होता, उन्हें कोमल मृगचर्म देता और दुर्गम मार्ग एवं निर्जन प्रान्तरमें वह पथिकोंके पीछे-पीछे जाकर उन्हें अभीष्ट स्थानपर पहुँचा आता था। उनके देनेपर भी उनसे कभी धन नहीं लेना चाहता और सबको अभयदान करता था। पिंगाक्षके रहनेसे विन्ध्याचलका वह भयानक वन नगर-सा हो गया था। उसके डरसे कोई भी राह चलनेवालोंकी रोक-टोक नहीं करता था।
पिंगाक्षके घरके समीप ही एक-दूसरे गाँवमें उसका चाचा निवास करता था। एक दिन उसने गेरुए वस्त्र धारण करनेवाले तीर्थयात्रियोंके समूहका बड़ा भारी कोलाहल सुना। उन यात्रियोंके पास बहुत धन था। वह नीच व्याध उस धनके लोभसे उन्हें मार डालनेको उद्यत हो गया और आगे जाकर बहुत छिपे हुए उसने उस मार्गको घेर लिया। उस समय पिंगाक्ष भी शिकार खेलनेके लिये उस जंगलमें गया था और रातमें उसी मार्गके समीप टिका हुआ था। यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विश्वनाथसे सुरक्षित होकर कुशलपूर्वक रहता है। अतः विद्वान् पुरुष कभी किसी भी जीवका अनिष्टचिन्तन न करे। होगा वही जो विधाताने रच रखा है। बुरा चाहनेवालोंको केवल पाप ही हाथ लगेगा। इसलिये आत्मसुखकी इच्छा रखनेवाला पुरुष किसीका बुरा न सोचे। यदि कुछ सोचना ही हो तो मोक्षके उपायका चिन्तन करे और किसी बात का नहीं *।
तदनन्तर जब रात बीतने लगी और प्रातःकाल निकट आ गया, उस समय बड़ा भारी कोलाहल मचा। एक ओरसे आवाज आयी—‘योद्धाओ! सबको मार डालो, नीचे गिरा दो और नंगे करके तलाशी लो।’ दूसरी ओरसे करुणाभरी पुकार सुनायी पड़ी—‘सिपाहियो! मत मारो, रक्षा करो, हम तीर्थयात्री हैं। हमारे पास जो कुछ है, उसे बिना परिश्रमके लूट लो और ले जाओ। हम अनाथ बटोही हैं, भगवान् विश्वनाथके उपासक हैं और उन्हींसे सनाथ हैं। पिंगाक्षके विश्वाससे हम सदा इस मार्गपर निर्भय होकर आया-जाया करते हैं, किंतु आज वह भी यहाँसे बहुत दूर है।’
तीर्थयात्रियोंकी यह बात सुनकर पिंगाक्ष दूरसे ही ‘मत डरो, मत डरो’ की रट लगाता हुआ सहसा वहाँ आ पहुँचा और बोला—‘यह कौन दुराचारी है, जो मुझ पिंगाक्षके जीते-जी मेरे प्राणोंके समान प्यारे पथिकोंको लूटना चाहता है।’ उसका यह वचन सुनकर उसके पापी पितृव्य ताराक्षने क्रोधपूर्वक अपने सेवकोंको आज्ञा दी—‘पहले इसीको मार डालो, उसके बाद इन साधु यात्रियोंको लूटना।’ यह सुनकर वे सभी दुराचारी भील मिलकर अकेले पिंगाक्षके साथ युद्ध करने लगे। किसी-किसी तरह उन सबका सामना करता हुआ पिंगाक्ष यात्रियोंको अपने घरके समीपतक ले गया। इसी बीचमें विरोधियोंके बाणोंसे उसके धनुष-बाण और कवच सभी कट गये। वे यात्री भी निर्भय होकर उसकी बस्तीमें पहुँच गये और उसने दूसरोंकी रक्षाके लिये लड़ते-लड़ते प्राण त्याग दिये। मरते समय उसके मनमें यह अभिलाषा थी कि यदि
* तस्मादात्मसुखं प्रेप्सुरनिष्टं न चिन्तयेत्। चिन्तयेच्चेतदा चिन्त्यो मोक्षोपायो न चेतरः॥ (स्क० पु०, का० पू० १२।३१)