भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 778
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४९

मंगल, बृहस्पति और शनिके लोकोंकी स्थिति

शिवशर्माने पूछा- यह किसका लोक है? भगवत्पार्षदोंने कहा-शिवशर्मन्! यह मंगलग्रहका लोक है। मंगलकी उत्पत्ति पृथ्वीसे हुई है, पृथ्वीमाताने ही उनका स्नेहपूर्वक पालन-पोषण किया है। जहाँ जगत्‌का हित करनेवाली असी और वरणा नामक दो शोभायमान नदियाँ उत्तरवाहिनी गंगासे मिली हैं, जहाँ मृत्युको प्राप्त हुए देहधारी जीव भगवान् विश्वनाथका महान् अनुग्रह प्राप्त करके अमृतमय ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं, उस काशीपुरीमें जाकर मंगलने अपने नामसे अंगारकेश्वरको स्थापित किया और वहाँ वे तबतक तपस्या करते रहे जबतक कि उनके शरीरसे प्रज्वलित अंगारके समान तेज नहीं निकला। अंगारके समान तेज प्रकट होनेसे वे सब लोकोंमें अंगारक नामसे विख्यात हुए। तदनन्तर उनसे सन्तुष्ट हुए महादेवजीने उन्हें महान् ग्रहका पद प्रदान किया। जो मनुष्य अंगारकचतुर्थीको उत्तरवाहिनी गंगाके जलमें स्नान करके अंगारकेश्वरकी पूजा और उन्हें नमस्कार करेंगे, उन्हें कभी कहीं भी ग्रहजनित पीड़ा नहीं होगी।

अगस्त्यजी कहते हैं- इस प्रकार सुन्दर एवं पुण्यमयी कथा कहते हुए भगवत्पार्षदोंको देवगुरु बृहस्पतिकी पुरी दृष्टिगोचर हुई।

शिवशर्माने पूछा- यह किसकी पुरी है? भगवत्पार्षदोंने कहा-सखे! प्रजापति अंगिराके पुत्र देवपूज्य बृहस्पति हुए। वे अपनी बुद्धिसे देवताओं और विद्वानोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। शान्त और जितेन्द्रिय हैं, उन्होंने क्रोधको जीत लिया है। उनकी वाणी मधुर और अन्तःकरण निर्मल है। वे वेदों और वेदार्थोंके तत्त्वज्ञ, समस्त कलाओंमें कुशल, निर्मल, समस्त शास्त्रोंमें पारंगत तथा नीतिविद्याके विशेषज्ञ हैं। वे हितका उपदेश करनेवाले, हितकारक, रूपवान्, सुशील, गुणवान्, देश-कालको जाननेवाले, समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले हैं। उन्होंने काशीमें तपस्वीजनोंकी वृत्तिका आश्रय लेकर और शिवजीकी मूर्तिकी स्थापना करके बड़ी भारी तपस्या की। तब भगवान् शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले- 'बृहस्पते! वर माँगो।' भगवान् शंकरको अपने सामने उपस्थित देख बृहस्पतिजी हर्षमें भर गये और इस प्रकार स्तुति करने लगे- 'चन्द्रमाके समान गौर कान्तिवाले, शान्तस्वरूप शंकर! आपकी जय हो। आप रुचिके अनुकूल मनोहर पदार्थों एवं चारों पुरुषार्थोंको देनेवाले हैं। सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले तथा नित्य शुद्ध हैं। पवित्र भक्तोंद्वारा शुद्धभावसे दी हुई महती उपहार-सामग्रीको ग्रहण करते हैं। भक्तजनोंपर आयी हुई घोर सन्ताप-परम्पराका आप नाश करनेवाले हैं। आपने सबके हृदयाकाशको व्याप्त कर रखा है। प्रणतजनोंको आप मनोवांछित वर देनेवाले हैं। शरणागत भक्तोंके पापरूपी महान् वनको जलानेके लिये दावानलस्वरूप हैं। अपने शरीरसे भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते रहते हैं। आपका श्रीअंग परम सुन्दर है। आप कामदेवके बाणोंको सुखा देनेवाले हैं। धैर्यनिधे! आपकी जय हो। आप मृत्यु आदि विकारोंसे सर्वथा रहित हैं तथा अपने चरणोंमें प्रणाम करनेवाले भक्तजनोंको भी मृत्यु आदि विकारोंसे रहित कर देते हैं। पुण्यात्मा पुरुषोंका मनोरथ पूर्ण करते और सर्पोंको आभूषणरूपमें धारण करते हैं। आपका वामांग भाग गिरिराजनन्दिनी उमासे व्याप्त है। आपने अपने सर्वव्यापी स्वरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। तीनों लोक आपके ही स्वरूप हैं, फिर भी आप इन सभी