संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७६१ ---|---
पुण्यात्मा शिवशर्मा जबतक भगवत्पार्षदोंके मुखसे इस प्रकार तपोलोककी महिमा सुनते रहे, तबतक उनके नेत्रोंके सामने परम प्रकाशमय सत्यलोक आ पहुँचा। वहाँ जाते ही वे दोनों पार्षद उनके साथ तुरंत ही विमानसे उतर पड़े और उन सबने समस्त लोकोंके स्रष्टा ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया।
ब्रह्माजी बोले— भगवत्पार्षदो! ये बुद्धिमान् ब्राह्मण शिवशर्मा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं। स्मृतियों और धर्मशास्त्रोंमें बताये हुए सदाचारके पालनमें परम प्रवीण हैं तथा पापकर्मोंसे सदा विमुख रहे हैं। परम बुद्धिमान् द्विज शिवशर्मन्! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। वत्स! तुमने उत्तम तीर्थमें प्राणत्याग करके बहुत ही अच्छा किया। तुमने यह जो कुछ देखा है, वह सब शीघ्र नष्ट होनेवाला है। मेरे प्रत्येक दिनके अन्तमें प्रलय होता है और मैं दिनके प्रारम्भमें बार-बार सृष्टि करता हूँ। जब स्वर्गादि लोकोंकी यह अवस्था है तब मरणशील मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। परंतु चार प्रकारके जीव (स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज तथा अण्डज) समुदायमेंसे मनुष्योंमें ही एक ऐसा गुण है कि वे कर्मभूमि भारतमें मनसहित चंचल इन्द्रियोंको जीतकर, गुणोंके शत्रु लोभका त्याग करके, धर्मकी परम्परा तथा धनराशिका नाश करनेवाले कामको विचारके द्वारा मनसे बाहर निकालकर, धैर्यसे क्रोधरूपी शत्रुको जीतकर और मदका परित्याग, अहंकारका निवारण तथा मोहका नाश करके, धर्मकी सीढ़ीपर चढ़कर, अनायास ही इस सत्यलोकमें आ जाते हैं। आर्यावर्तके समान देश, काशीके समान पुरी तथा विश्वनाथजीके समान लिंग इस ब्रह्माण्डमण्डलमें कहीं भी नहीं है। समुद्रके बीचमें अनेक द्वीप हैं, किंतु इस पृथ्वीपर जम्बूद्वीपके समान दूसरा कोई द्वीप नहीं है। जम्बूद्वीपमें भी नौ वर्ष हैं, जिनमें भारतवर्ष सबसे श्रेष्ठ है। इसे कर्मभूमि कहा गया है। यह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। किंपुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, वे देवभोग्य हैं; उनमें देवतालोग स्वर्गसे आकर रमण करते हैं। यह भारतवर्ष नौ हजार योजन विस्तृत है। इस भारतवर्षमें भी हिमवान् और विन्ध्यगिरिके बीचका भाग अत्यन्त पुण्यदायक है। इसमें भी गंगा और यमुनाके बीचका भाग पृथ्वीकी अन्तर्वेदी है। यहाँके क्षेत्रोंमें कुरुक्षेत्र सबसे बढ़कर है। उससे भी उत्तम नैमिषारण्यक्षेत्र है जो स्वर्गका श्रेष्ठ साधन है। इस समस्त भूमण्डलमें नैमिषारण्यसे तथा अन्य सब तीर्थोंसे भी बढ़कर तीर्थराज प्रयाग है। वह स्वर्ग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाला है। इसीलिये प्रयाग महान् क्षेत्र है और उसे सब तीर्थोंका राजा माना गया है। मैंने पूर्वकालमें सब यज्ञोंको एक ओर तराजूपर रखा और दूसरी ओर तीर्थोंमें श्रेष्ठ प्रयागको रखा, किंतु उसीका पलड़ा भारी रहा। दक्षिणा आदिसे पुष्ट समस्त यागोंकी अपेक्षा इस क्षेत्रको प्रधान देखकर विष्णु और शिव आदिने उसका नाम प्रयाग रख दिया। उसके नाममात्रका तीनों कालमें स्मरण करनेसे मनुष्यके शरीरमें कभी कहीं पाप नहीं ठहरता है। असंख्य जन्मान्तरोंमें जिस पापराशिका संग्रह किया गया है, व्रत, दान, जप और तपसे भी जिसको दूर करना अत्यन्त कठिन है, वह पापराशि भी जब कोई तीर्थराज प्रयागमें जानेके लिये उद्यत होता है, तब आँधीके मारे हुए वृक्षकी भाँति शरीरके भीतर थर-थर काँपने लगती है। तत्पश्चात् प्रयाग जानेका दृढ़ संकल्प लेकर जो आधा रास्ता तय कर लेता है, उस पुरुषके शरीरसे वह पापराशि पग-पगपर निकलनेकी इच्छा करती है। यदि भाग्यवश उस महात्माको तीर्थराज प्रयागका दर्शन हो जाता है, तब तो उसके पाप उसी प्रकार शीघ्र भाग जाते हैं, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार। सात धातुओंके बने हुए मानवशरीरमें जो-जो पाप हैं, वे केशोंमें आकर ठहरते हैं। अतः केशोंका मुण्डन करा देनेपर वे भी निकल जाते हैं। इस प्रकार निष्पाप होकर, गंगा-यमुनाके श्वेत-श्याम सलिलके संगममें स्नान करना चाहिये। उस स्नानसे मनुष्य महान् पुण्यराशि, मनोवांछित पुण्यमय भोग तथा स्वर्गको भी पाता है और जो निष्काम भावसे स्नान करता है, वह मोक्ष पाता है। ब्रह्मन्!