संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७६७
महादेवजीने कहा—'अच्युत ! तुम महाविष्णु हो, तुम्हारे निःश्वाससे वेद प्रकट होंगे और उनसे तुम सब कुछ जानोगे।' उनसे ऐसा कहकर भगवान् शिव शिवाके साथ पुनः आनन्दकाननमें प्रवेश कर गये।
तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने क्षणभर ध्यानमें तत्पर हो तपस्यामें ही मन लगाया। उन्होंने अपने चक्रसे एक सुन्दर पुष्करिणी खोदकर उसे अपने शरीरके पसीनेके जलसे भर दिया। फिर उसीके किनारे घोर तपस्या की। तब शिवजी पार्वतीजीके साथ वहाँ प्रकट हुए और बोले—'महाविष्णो ! वर माँगो।'
श्रीविष्णु बोले—देवदेव महेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं सदा भवानीसहित आपका दर्शन करना चाहता हूँ।
भगवान् शिव बोले—'एवमस्तु'। जनार्दन ! इस स्थानपर मेरी मणिजटित कर्णिका (मणिमय कुण्डल) गिर पड़ी है, इसलिये इस तीर्थका नाम मणिकर्णिका हो।
श्रीविष्णुने कहा—प्रभो ! यहाँ मुक्तामय कुण्डल गिरनेसे यह उत्तम तीर्थ मुक्तिका प्रधान क्षेत्र हो। यहाँ शिवस्वरूप अनिर्वचनीय ज्योति प्रकाशित होती है, इसलिये इसका दूसरा नाम 'काशी' प्रसिद्ध हो। चार प्रकारके जीवसमुदायमें ब्रह्मासे लेकर कीटकतक जितने भी जीव हैं, वे सब काशीमें मरनेपर मोक्षको प्राप्त हों तथा इस मणिकर्णिका नामक श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान, सन्ध्या, जप, होम, वेदाध्ययन, तर्पण, पिण्डदान, गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, अश्व, दीप, अन्न, वस्त्र, आभूषण और कन्या—इन सबका दान, अनेक यज्ञ, व्रतोद्यापन, वृषोत्सर्ग और शिवलिंग आदिकी स्थापना—इत्यादि शुभकर्मोंको जो बुद्धिमान् मनुष्य करे, उसके उस कर्मका फल मोक्ष हो। जो है, जो होगा और जो हो चुका है, उन सबसे यह क्षेत्र अधिक एवं शुभोदयकारी हो। काशीका नाम लेनेवाले लोगोंके भी पापका सदा ही क्षय हो।
श्रीमहादेवजी बोले—महाबाहु विष्णु ! तुम नाना प्रकारकी यथायोग्य सृष्टि करो और जो पापके मार्गपर चलनेवाले दुष्टात्मा हैं, उनका संहार करनेमें कारण बनो। यह पाँच-पाँच कोसका लम्बा-चौड़ा क्षेत्र काशीधाम मुझे बहुत प्रिय है। यहाँ केवल मेरी आज्ञा चल सकती है, यमराज आदि दूसरोंकी नहीं। अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करनेवाले पापी जीवोंका भी मैं ही शासक हूँ, दूसरा नहीं। काशीसे सौ योजन दूर रहकर भी जो इस क्षेत्रका मन-ही-मन स्मरण करता है, वह पापोंसे पीड़ित नहीं होता। काशीमें पहुँचकर मनुष्य उसके पुण्यसे मोक्षपदका भागी होता है। जो मन-इन्द्रियोंको वशमें रखकर काशीमें बहुत समयतक निवास करके भी दैवयोगसे अन्यत्र मृत्युको प्राप्त होता है, वह भी स्वर्गीय सुख भोगकर अन्तमें काशीको प्राप्त हो मोक्षसम्पत्तिको पा लेता है। जो भगवान् विश्वनाथकी प्रसन्नताके लिये काशीमें न्यायपूर्वक धन देता है, अथवा निधन (मृत्यु)-को प्राप्त होता है, वह धन्य है और वही धर्मका ज्ञाता है। पाँच कोसका लम्बा-चौड़ा सम्पूर्ण अविमुक्त क्षेत्र विश्वनाथ नामसे प्रसिद्ध एक ज्योतिर्लिंगस्वरूप है, ऐसा जानना चाहिये। जैसे आकाशके एक देशमें स्थित होनेपर भी सर्वगत सूर्यमण्डल सबको दिखायी देता