संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 828, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७९९
हुए मन-ही-मन कहने लगा—'शम्भो! अब मैं कहाँ जाऊँ? कहाँ रहनेसे मेरा कल्याण होगा। मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है, मैंने पहलेसे सुन रखा है कि जिनकी कहीं भी गति नहीं है उनकी गति काशीपुरी ही है।'
ऐसा विचार करके हरिकेश काशीपुरीको चला गया। उस आनन्दवनमें पहुँचकर उसने तपस्याकी शरण ली। एक दिन उस वनमें विचरते हुए भगवान् शंकर पार्वतीदेवीसे इस प्रकार बोले—'देवि! जैसे तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, उसी प्रकार यह आनन्दवन भी मुझे अत्यन्त प्रिय लगता है। यहाँ मेरे अनुग्रहसे मृत्युको प्राप्त हुए जीव अमृतरूपको प्राप्त हो गये हैं। संसारमें उनका पुनर्जन्म नहीं होता। जो संसारी जीव काशीमें प्राणत्याग करते हैं उनके कर्मोंके संस्कार मेरी आज्ञासे चिताकी आगमें ही भस्म हो जाते हैं। जीव ब्रह्मज्ञानसे मुक्त होते हैं अथवा ब्रह्मज्ञानमय क्षेत्र प्रयागमें शरीर त्याग करनेसे मुक्त होते हैं। उसी ब्रह्मज्ञानका तारकमन्त्रके रूपमें मैं काशीमें मरनेवाले प्राणियोंके लिये उपदेश करता हूँ, जिससे वे तत्काल मुक्त हो जाते हैं। कलियुगमें जिनका अन्तःकरण मलिन हो गया है तथा जिनकी इन्द्रियाँ स्वभावसे ही चंचल हैं, उन्हें ब्रह्मज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है? अतः उनके लिये मैं काशीपुरीमें तारक ब्रह्मका उपदेश देता हूँ। कलियुगमें मुझ विश्वनाथ देवका, काशीपुरीका, भागीरथी गंगाका और दानका विशेष महत्त्व है। काशीमें उत्तरवाहिनी गंगा और मेरा विश्वेश्वर नामक लिंग—ये दोनों मनुष्योंको मुक्ति देनेवाले हैं। कलिमें दानजनित पुण्यके बलसे इनकी प्राप्ति हो सकती है। योगियोंके हृदयाकाशमें, कैलासमें तथा मन्दराचल पर्वतपर भी निवास करनेकी मेरी वैसी रुचि नहीं है जैसी कि काशीपुरीमें निवास करनेकी मेरी रुचि रहती है।'
इस प्रकार बातचीत करते हुए महादेवजीने हरिकेशको देखा जो आनन्दवनके मध्यभागमें अशोक वृक्षके नीचे उसकी जड़के समीप बैठकर तपस्या कर रहा था। उसका शरीर तनिक भी हिलता-डुलता नहीं था। वह ऐसा जान पड़ता था मानो सूखी नस-नाड़ियोंसे बँधा हुआ कोई हड्डियोंका ढेर हो। उसे इस रूपमें देखकर पार्वतीदेवीने महादेवजीसे निवेदन किया—'नाथ! यह आपका तपस्वी भक्त है, इसे वरदान देकर प्रसन्न कीजिये।
इसका चित्त एकमात्र आपमें ही लगा हुआ है, इसका जीवन भी आपके ही अधीन है। यह आपकी ही प्रसन्नताके लिये सब कर्म करता और आपकीही शरणमें रहता है। कठोर तपस्यासे इसका सारा अंग सूख गया है। अतः इस यक्षको वरदान देकर आप इसपर अनुग्रह करें। तब भगवान् शिवने दयार्द्रचित्त होकर समाधिमें आँख बंद करके बैठे हुए हरिकेशका अपने हाथसे स्पर्श किया। स्पर्श पाकर यक्षने आँखें खोल दीं और भगवान् त्रिलोचनको सामने देखकर हर्षगद्गद वाणीमें कहा—ईश! आपकी जय हो। शम्भो! गिरिजापते! शंकर! त्रिशूलपाणे! चन्द्रार्धशेखर! कृपालो! आपके कर-कमलोंका स्पर्श पाकर मेरा यह शरीर अमृतस्वरूप हो गया।' भगवान् महेश्वरने उस भक्तकी कही हुई यह कोमल वाणी सुनकर