संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 848, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * \hfill ८१९
अभय प्रदान करते हैं। अग्नि और गृहसे रहित हो सदा अकेला ही विचरता रहे। मोक्षकी सिद्धिके लिये दूसरेकी सहायतासे रहित अकेला रहे। केवल अन्नकी भिक्षाके लिये गाँवमें जाना चाहिये। संन्यासी न तो जीनेकी इच्छा करे न तो मरनेकी ही। जैसे सेवक अपने स्वामीके आदेशकी प्रतीक्षा करता है वैसे ही संन्यासी मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता है। जो कहीं भी ममता नहीं रखता और सर्वत्र समताके भावसे युक्त रहता है, वृक्षके नीचे ही जो सो लेता है, वही मुमुक्षु इस लोकमें प्रशंसित होता है। प्रतिदिन ध्यान लगाना, बाहर और भीतरसे पवित्र रहना, भिक्षा लाना और नित्य एकान्तमें रहना—ये ही चार कर्म संन्यासीके हैं। इनसे भिन्न कोई पाँचवाँ कर्म नहीं है^१। वर्षाके चार महीनोंमें संन्यासी कहीं विचरण न करे; क्योंकि उस समय यात्रा करनेसे नूतन बीजके अंकुरों और जीव-जन्तुओंकी हिंसा होती है। संन्यासी जीव-जन्तुओंको बचाते हुए चले, वस्त्रसे छानकर जल पीये, उद्वेगरहित वचन बोले, कभी किसीके साथ क्रोधपूर्ण बर्ताव न करे, अपने आत्माके साथ विचरे, किसीसे कोई अपेक्षा न रखे, अपने लिये कोई घर अथवा आश्रय न बनावे, सदा अध्यात्म-चिन्तनमें तत्पर रहे, केश और नख आदिका संस्कार न करे, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे, भगवाँ रंगका वस्त्र पहने, दण्ड धारण करे, भिक्षाके अन्नका भोजन करे और अपनी प्रसिद्धि न होने दे। तुम्बी, काष्ठ, मिट्टी अथवा बाँसका पात्र संन्यासीके लिये उत्तम है। इनसे भिन्न किसी पाँचवीं वस्तुका पात्र नहीं होना चाहिये। संन्यासीको कभी तैजसपात्र (पीतल, काँसी आदिका बर्तन) नहीं ग्रहण करना चाहिये। 'यति यदि प्रतिदिन कौड़ी-कौड़ीभर भी जहाँ-तहाँसे धन संग्रह करे तो उसे एक सहस्र गौओंके वधका पाप लगता है' यह सनातन श्रुति है। यदि एक दिन भी वह हृदयमें स्नेहभावसे (आसक्तिपूर्वक) किसी स्त्रीको देख ले तो उसे दो करोड़ ब्रह्मकल्पोंतक कुम्भीपाक नरकमें निवास करना पड़ता है, इसमें संशय नहीं^२। वह केवल एक समय भिक्षाके लिये विचरण करे, उसमें भी विस्तार न करे। जब रसोईघरसे धुँआ निकलना बंद हो जाय, मूसलसे कूटनेकी आवाज न होती हो, चूल्हेकी आग बुझ गयी हो और घरके सब लोग खा-पी चुके हों तब संन्यासी गृहस्थके घर भिक्षाके लिये जाय। भिक्षाके विषयमें उसे सदा इसी नियमका पालन करना चाहिये। जो थोड़ा खाता, एकान्तमें रहता, विषयोंके लिये लोलुप नहीं रहता तथा राग-द्वेषसे मुक्त होता है वही संन्यासी मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। जिसके घर अथवा आश्रममें कोई संन्यासी दो घड़ी भी विश्राम कर ले वह कृतार्थ हो जाता है। गृहस्थने मृत्युपर्यन्त जो पापसंचय किया है वह सब पाप संन्यासी एक रात उसके घरमें विश्राम करके ही भस्म कर डालता है।
बुढ़ापा सबको दबा लेता है, जिससे असह्य दुःख होता है। रोगकी पीड़ा भी सहनी पड़ती है। एक दिन इस शरीरको त्याग देना पड़ता है। पुनः गर्भमें आकर जीव अत्यन्त भयंकर क्लेश भोगता है। अनेक प्रकारकी योनियोंमें वह निवास करनेको विवश होता है। उसे कभी प्रियजनोंके वियोगका और कभी अप्रिय जनोंके संयोगका कष्ट प्राप्त होता है। अधर्मसे दुःखकी
१- ध्यानं शौचं तथा भिक्षा नित्यमेकान्तशीलता। यतेश्चत्वारि कर्माणि पञ्चमं नोपपद्यते॥ (स्क० पु०, का० पू० ४१। २०)
२- वराटके संगृहीते यत्र तत्र दिने दिने। गोसहस्रवधं पापं श्रुतिरेषा सनातनी॥
हृदि सस्नेहभावेन चेद्दद्रक्ष्येत्स्त्रियमेकदा^१। कोटिद्वयं ब्रह्मकल्पं कुम्भीपाकी न संशयः॥
\hfill (स्क० पु०, का० पू० ४१। २५, २७)
१- 'चेत् रक्षेत्' ऐसा पदच्छेद करनेपर ऐसा अर्थ होगा कि यदि संन्यासी कामभावसे एक बार भी अपने हृदयमें किसी स्त्रीको रखे—उसका चिन्तन करे तो दो करोड़ ब्रह्मकल्पतक उसे कुम्भीपाकमें रहना पड़ता है।