संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 883, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें८५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नाम यज्ञवाराह है। विदारनारसिंह नामवाले तीर्थमें मैं विदारनारसिंह नामसे ही सेवन करने योग्य हूँ। गोपीगोविन्द नामक तीर्थमें मैं गोपीगोविन्द नामसे ही प्रसिद्ध हूँ। लक्ष्मीनृसिंह नामवाले पावन तीर्थमें मैं लक्ष्मीनृसिंह हूँ। पापहारी शेषतीर्थमें मैं शेषमाधव हूँ। शंखमाधवतीर्थमें मेरा नाम शंखमाधव है। हयग्रीव महातीर्थमें हयग्रीवकेशव नामसे मेरी प्रसिद्धि है। वृद्धिकालेश्वरसे पश्चिम मैं भीष्मकेशव नामसे प्रसिद्ध हूँ। लोलार्कसे उत्तर भागमें मेरा नाम निर्वाणकेशव है। त्रिपुरसुन्दरी देवीसे दक्षिण भागमें जो त्रिभुवनकेशव नामसे मेरी पूजा करेगा वह फिर कभी गर्भमें नहीं आवेगा। ज्ञानवापीके पूर्वभागमें मैं ज्ञानमाधवके नामसे प्रसिद्ध हूँ। विशालाक्षी देवीके समीप मैं श्वेतमाधवके नामसे स्थित हूँ। दशाश्वमेधसे उत्तरमें स्थित मुझ प्रयागमाधवका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार जब भगवान् विन्दुमाधव अग्निविन्दु मुनिको काशीमें स्थित अपने विभिन्न स्वरूपोंका परिचय देते हुए माहात्म्य-कथा सुना रहे थे, उसी समय उन्हें गरुड़जी दिखायी दिये। गरुड़ने भगवान्को प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीके शुभागमनकी सूचना दी।
भगवान्ने पूछा—महादेवजी कहाँ हैं?
गरुड़ बोले—जिसकी ध्वजापर महान् वृषभका चिह्न शोभा पाता है तथा जिसके रत्नमय ध्वजकी प्रभा इस पृथ्वी और आकाशको परिपूर्ण किये दे रही है, वह यह महादेवजीका रथ आ रहा है। उसका प्रत्यक्ष दर्शन कीजिये। तब श्रीहरिने भगवान् त्रिलोचनके वृषभ-ध्वजका दर्शन करके उसे दूरसे ही प्रणाम किया और अग्निविन्दु मुनिसे कहा—'मुने! तुम अपने दाहिने हाथसे इस सुदर्शनचक्रका स्पर्श कर लो।' भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर उन्होंने ज्यों ही सुदर्शनका स्पर्श किया त्यों ही श्रीहरिके महान् अनुग्रहसे वे 'सुदर्शन' हो गये।
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! फिर अग्निविन्दु मुनि ज्योतिःस्वरूप होकर भगवान् विन्दुमाधवकी सेवाके प्रभावसे उनकी दिव्य चिन्मय ज्योतिस्स्वरूपा कौस्तुभमणिमें मिलकर एकीभूत हो गये। जिन्होंने विन्दुमाधवके चरणारविन्दोंमें अपने चित्तको चंचरीककी भाँति लगा रखा है, वे भी अग्निविन्दु की भाँति निश्चय ही भगवत्स्वरूपको प्राप्त होते हैं। इसलिये सदा काशीमें निवास, श्रीविन्दुमाधवका दर्शन और इस माहात्म्य-कथाका श्रवण करना चाहिये तथा ऐसा करके लौकिक गतिपर विजय पानी चाहिये। पंचनदकी उत्पत्ति-कथा पुण्यमयी है। भगवान् विन्दुमाधवकी कथा भी परम पवित्र है और काशीका निवास भी अतिशय पुण्यजनक है—ये तीनों बातें पुण्यात्माओंको ही सुलभ हैं।
~~ ० ~~
भगवान् शिवका स्वागत या वृषभध्वजतीर्थकी महिमा तथा शिवका काशीपुरीमें प्रवेश
स्कन्दजी कहते हैं—तदनन्तर श्रीहरि ब्रह्माजीको आगे करके भगवान् शंकरकी अगवानीके लिये आगे बढ़े। देवाधिदेव भगवान् वृषभध्वजको देखकर श्रीविष्णुने उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् फलसहित भीगे अक्षतोंको दिखाते हुए ब्रह्माजीने स्वस्तिवाचनके लिये हाथ ऊँचे करके रुद्रसूक्तोंसे भगवान् शिवका स्तवन किया। श्रीगणेशजीने उनके चरणारविन्दोंमें मस्तक रखकर शीघ्रतापूर्वक नमस्कार किया। तब महादेवजीने हर्षमें भरकर गणेशजीका मस्तक सूंघा और उन्हें हृदयसे लगाकर अपने आसनपर बिठा लिया। सोम और नन्दी आदि गणोंने साष्टांग प्रणाम किया। योगिनियोंने भी महेश्वरको प्रणाम करके मंगलगान किया। तत्पश्चात् सूर्यदेवने शिवजीको नमस्कार किया। चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवने श्रीहरिको अपने सिंहासनके समीप ही वामभागमें बड़े आदरके साथ बिठाया और ब्रह्माजीको