भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 892
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८६३ ---|--- प्रकार काँखमें कुचला जाता हुआ वह दैत्य आकाश और पृथ्वीको गुँजाता हुआ आर्तनाद करने लगा। उसका चीत्कार सुनकर बहुत-से तपस्वी रात्रिमें उसी शब्दका लक्ष्य करके उस पर्णशालामें आ पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा—भगवान् शंकर अपनी काँखमें एक व्याघ्रको दबाये हुए खड़े हैं। यह देख सबने जय-जयकार करते हुए उनके चरणोंमें प्रणाम और स्तवन किया। 'जगद्गुरो! ईश! आप हमपर अनुग्रह कीजिये और इसी रूपमें व्याघ्रेश नाम धारण | करके यहाँ निवास कीजिये। महादेव! इस श्रेष्ठ स्थानकी आप सदैव रक्षा करें।'<br><br>उन तपोधनोंका ऐसा वचन सुनकर चन्द्रभूषण भगवान् शिवने कहा—'ब्राह्मणो! ऐसा ही हो। जो श्रद्धापूर्वक यहाँ इस रूपमें मेरा दर्शन करेगा, उसके समस्त उपद्रवोंका मैं निश्चय ही नाश करूँगा।' ऐसा कहकर महादेवजी उस शिवलिंगमें लयको प्राप्त हो गये। तबसे वह शिवलिंग व्याघ्रेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ज्येष्ठेश्वरके उत्तरभागमें उसका दर्शन और स्पर्श करनेपर वह सम्पूर्ण भयोंका नाश करनेवाला है।

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हिमवान्‌के द्वारा काशीमें शैलेश्वर लिंगकी प्रतिष्ठा

कार्तिकेयजी कहते हैं—एक समय पर्वतराज हिमवान्‌से उनकी पतिव्रता पत्नी मेनाने कहा—'आर्यपुत्र! मैं विवाहके बादसे अपनी बेटी गौरीका समाचार न पा सकी। इस समय महादेवजी कहाँ हैं? प्रभो! वे एक और अद्वितीय हैं। उन त्रिशूलधारी भगवान् शिवका समाचार जाननेके लिये कोई उद्योग कीजिये।'<br><br>गिरिराज हिमवान् बोले—देवि! मैं अपनी प्यारी पुत्रीकी खोज करनेके लिये स्वयं ही जाऊँगा। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि जबसे गौरी मेरे घरसे गयी है तबसे इस घरकी लक्ष्मी ही चली गयी। ऐसा कहकर भाँति-भाँतिके रत्न और वस्त्र साथ ले गिरिराज हिमवान् शुभ लग्नमें घरसे चले। बहुत दूर आगे जानेपर उन्होंने दूरसे ही काशीपुरीको देखा जो कि मणियोंकी ज्योतिसे जगमगा रही थी और अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करनेवाली थी। सब ओर वैजयन्ती पताकाओंके समुदायसे सुशोभित वह पुरी स्वर्गलोककी अमरावती-सी जान पड़ती थी। इसी समय वहाँ उन्हें कोई तीर्थयात्री दिखायी दिया। पर्वतराजने उसे बुलाकर आदरपूर्वक पूछा—'भाई कार्पटिक! यहाँका वृत्तान्त कहो, यह कौन-सा अपूर्व नगर है? इस समय यहाँका अधिष्ठाता कौन है और उसका कर्म क्या है?'<br><br>कार्पटिक बोला—मानद! अभी तो पाँच-छः | दिन ही बीते हैं, गिरिराजनन्दिनी गौरीके पति भगवान् विश्वनाथ यहाँ काशीपुरीमें मन्दराचलसे पधारे हैं। यहाँके राजा दिवोदास परम धामको चले गये। जो सम्पूर्ण जगत्‌के अधिष्ठाता हैं, वे ही भगवान् शंकर इस काशीपुरीके भी स्वामी हैं। वे ही सब कुछ देनेवाले हैं। पर्वतराज हिमवान् भी श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी पुत्री देकर भगवान् विश्वनाथको सन्तुष्ट किया है। वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमेश्वर शिवजीकी चेष्टाओंको कौन जानता है। मैं तो बहुत थोड़ा और इतना ही जानता हूँ कि यह सब जगत् उन्हींकी रचना है। इस समय भगवान् शिव गिरिराजकुमारी पार्वतीजीके साथ काशीके ज्येष्ठेश्वर नामक स्थानमें ठहरे हुए हैं। भगवान् विश्वनाथके लिये विश्वकर्माद्वारा जिस विशाल प्रासाद (मन्दिर)-का निर्माण किया जा रहा है, वह अपूर्व है। वैसा तो मैंने अपने कानोंसे कभी सुना भी नहीं है। जहाँ मणियों और रत्नोंकी शलाकाओंसे मन्दिरकी दीवारें बनायी गयी हैं, उस मन्दिरमें एक सौ बारह खम्भे हैं जो सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होते हैं। ऐसा अपूर्व वैभव जिनके समीप सदा प्रकट होता है, उन भगवान् उमाकान्तको आप कैसे नहीं जानते?<br><br>अगस्त्य! अपने जामाताकी उस अद्भुत समृद्धिका वर्णन सुनकर पर्वतराज लज्जासे दब गये। उन्होंने