भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 913

८८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तथा आप ही मोक्षरूप हैं। आप ही आत्मा, परमात्मा और चराचर जगत्के अन्तरात्मा हैं। आपसे ही जगत्की उत्पत्ति हुई है। आप साक्षात् जगत्स्वरूप ही हैं। यह जगत् आपका ही है। आप ही इसके एकमात्र बन्धु हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप होकर इस विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। वैदिक मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंके लिये आप ही मृड (सुख)-रूप हैं और वेदविरुद्ध पथपर चलनेवाले लोगोंके लिये आप भीम (अत्यन्त भयंकर) हैं। साम्बशिव! आप भक्तोंके लिये कल्याणकारी शंकर हैं। जिनके मन और वचनमें नम्रता है, ऐसे पुरुषोंके लिये आप शिवस्वरूप हैं। जो आपके चरणारविन्दोंकी शरण लेते हैं, ऐसे भक्तोंके लिये आप श्रीकण्ठ हैं—उनपर आयी हुई विपत्तिरूपी हालाहल विषको पी जानेवाले हैं। शान्त! शम्भो! शंकर! चन्द्रकलाविभूषण! पिनाकपाणे! सर्पोंको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, आपको नमस्कार है। प्रभो! वही धन्य है जो आपमें भक्ति रखता है। वही पुण्यात्मा है जो आपकी पूजा करनेवाला है। अनन्तशक्ते! मेरे-जैसा अल्प बुद्धि-वैभवसे युक्त कौन मनुष्य यहाँ आपकी स्तुति कर सकता है। प्राचीन वेदवाणीके लिये भी जो अगम्य हैं, ऐसे आपकी स्तुति केवल नमस्कारमात्र ही है।

स्कन्दजी कहते हैं—ऐसा कहकर यमराजने 'ॐ नमः शिवाय' इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए भगवान् शंकरको सहस्रों बार प्रणाम किया। तदनन्तर परमेश्वर शिवने यमराजको नमस्कारसे रोककर इस प्रकार वरदान दिया—'सूर्यनन्दन! तुम (कर्म और स्वरूपसे तो धर्म हो ही,) नामसे भी 'धर्मराज' हो जाओ। आजसे तुम समस्त चराचर प्राणियोंके धर्माधर्मके निर्णयमें मेरे द्वारा नियुक्त होकर मेरी आज्ञासे सबका शासन करो। तुम दक्षिण दिशाके अधिपति और समस्त जीवोंके कर्मके साक्षी होओ। उत्तम और अधम मनुष्य तुम्हारे दिखाये हुए मार्गसे ही कर्मानुसार गति प्राप्त करें। धर्म! मुझमें भक्ति रखते हुए तुमने जो यहाँ मेरे लिंगविग्रहकी आराधना की है उसके दर्शन, स्पर्श और पूजनसे मनुष्योंको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होगी। जो विशुद्ध बुद्धिवाला पुरुष तुम्हारे आगे इस धर्म-तीर्थमें स्नान करके एक बार भी धर्मेश्वरका दर्शन करेगा उसके समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धि उससे दूर नहीं है। जो मनुष्य कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवासपूर्वक धर्मेश्वर तीर्थकी यात्रा करेंगे तथा रात्रिकालमें महान् उत्सवके साथ जागरण करेंगे, वे फिर इस पृथ्वीपर जन्म नहीं लेंगे।'

ऐसा कहकर परम सुखदायक भगवान् शिवने अपने हाथोंसे धर्मराजका स्पर्श किया। उनके करस्पर्शजनित सुखसे आनन्दमग्न हो धर्मराजने महादेवजीसे कहा—'सर्वज्ञ! करुणानिधान! ईश्वर! जब आपका प्रत्यक्ष दर्शन मिल गया तब मुझे दूसरे किसी वरकी क्या आवश्यकता है? नाथ! जिनको वेद भी भलीभाँति नहीं जानते तथा वेद-पुरुष ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं जानते, उनसे भी यदि मैं वर पानेयोग्य हूँ, तो यही प्रार्थना करता हूँ कि ये जो पक्षियोंके मधुर बोली बोलनेवाले बच्चे हैं, जिनका कि मेरे सामने जन्म हुआ है, इनकी उत्पत्तिके समय रोगसे पीड़ित हो इनकी माता शुकी मृत्युको प्राप्त हुई और इनके पिता शुकको बाजने खा डाला है। अनाथनाथ! मेरे द्वारा रक्षित इन असहाय बच्चोंको आप वरदान दीजिये।' अगस्त्य! इस प्रकार धर्मराजका परोपकारयुक्त निर्मल वचन सुनकर शंकरजीने उन पक्षियोंको बुलाया और कहा—'पक्षियो! तुम बोलो, तुम्हारे लिये कौन-सा वरदान देना चाहिये।'

पक्षी बोले—संसारबन्धनका नाश करनेवाले परमेश्वर! आपको नमस्कार है। अनाथनाथ! सर्वज्ञ! त्रिनेत्र! हम पक्षीकी योनिमें जन्म लेकर भी जो आपका प्रत्यक्ष दर्शन कर सके हैं तथा आपकी कृपादृष्टिके भाजन हो सके हैं, इससे बढ़कर मनोवांछित वर और क्या हो सकता