भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

वर्णन है। अद्वैत ज्ञान और शक्ति उपासना दोनों के पारस्परिक मेल की आवश्यकता और विधिक्रम शृंगेरी आदि मठों में देखा जा सकता है। मानव जाति के परम उच्च तम उन्नत्तावकास की समाप्ति अद्वैत ब्रह्मानुभूति में कही गई है, जिस के लिये अनेक ब्रह्मविद्यापर साधन हैं, उनमें श्रीचक्र की उपासना एक बडे महत्व का साधन है। श्रीचक्र रेखा गणित के प्रमाण से दैवी शक्तियों का एक प्रतीक स्वरूप यंत्र बनाया गया है। भौतिक यंत्रों के सदृश यह भी अध्यात्म विज्ञान के विद्वानों की आध्यात्मिक खोज का फल है, जिस के द्वारा मनुष्य जीवन को आध्यात्म शक्ति की उपलब्धि करके सार्थक किया जा सकता है। इस विषय का साहित्य भंडार अरण्यको उपनिषदों और तंत्रों में मिलता है।

श्री चक्र की उपास्य देवता श्री ललिता त्रिपुरा है। मंत्र के मनन द्वारा मन का तत्सम्बन्धी देवता से तादात्म्य किया जाता है। श्री ललिता त्रिपुरम्बा के मंत्र का निर्देश सौन्दर्य लहरी के श्लोक ३२ व ३३ में हैं, जिसका विशेष रहस्य श्री भास्कर राय के वरिवस्या नामक ग्रंथ से जाना जा सकता है। श्री ब्रह्म गायत्री का वैदिक मंत्र और श्री विद्या का कादि हादि तांत्रिक मंत्रों को एकार्थी ही समझना चाहिये, जैसे विभिन्न वर्णों की गायों का दूध एक जैसा मधुर होता है। देखें त्रिपुरातापिनी उपनिषद्।

श्री भगवती की उपासना जैसे मंत्र यंत्र द्वारा बाहर की जाती है वैसे ही शरीर के अभ्यन्तर षट् चक्र एवं नाडियों (ईडा, पिंगला सुषुम्ना) में देवता रूपी शक्तियों के केन्द्रों की सहायता से योग

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 11, कुल 415 में से · BharatKosha