भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी ९५


और लहरी से ल हीं लेकर हादि विद्या के तीनों कूटों को ग्रहण किया जा सकता है । कं * सुख वाचक शब्द है, कं ब्रह्म और प्राण वाचक भी है देखे छान्दोग्य (४, १०, ५) । इस श्लोक की अगले श्लोक से संगति करने से हादि विद्या को षट् चक्र वेध विद्या समझना चाहिये ।

षट् चक्र वेध अर्थात उन्नेय भूमिका ।

[ ९ ]

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदिमरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वाकुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥

अर्थः— पृथिवी तत्व को मूलाधार में और जल को भी ( मूलाधार में ही ) मणिपूर में अग्नितत्व को जिसकी स्थिति स्वाधिष्ठान में है, हृदय में वायु तत्व को और ऊपर विशुद्ध चक्र ) में आकाश तत्व को, और मन को भी भ्रूमध्य में, इस प्रकार सकल कुल पथ ( शक्ति के मार्ग ) का वेध करके तू सहस्रार पद्म में अपने पति के साथ एकान्त में विहार करती है ।

सं० टि० यहां अन्तर्याग का वर्णन है, कुण्डलिनी शक्ति का षट चक्र वेध पूर्वक आरोहण बताया गया है ।


* नोट:—कं शिरः सुख वारिषु-विश्वः, सुखशीर्ष जलेषु कं इति मेदिनी ।