सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०२ | सौंदर्य लहरी
अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वामात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥
अर्थः— अमृत धाराओं की वर्षा से, जो तेरे दोनों चरणों के बीच से टपकती हैं, प्रपंच को सींचती हुई फिर छओं आम्नायों से होती हुई अथवा छओं चक्रों द्वारा सींचती हुई, अपनी भूमि पर उतरकर अपने आप को सर्पिणी के सदृश साडेतीन कुंडल डालकर, हे कुहरिणि ! तू कुल कुंड में सोती है ।
स० टि० यहां पर कुण्डलिनी का सहस्रार में कुछ समय ठहर कर फिर अपने स्थान में उतर आना दिखाया गया है । रस=छः चक्र, आम्नाय=विधान, महस्=प्रकाश । प्रपंच=देह, पिण्ड । कुल कुण्ड=कुण्डलिनी के रहने का कुंड, कुहरिणी= गुहा में रहने वाली । (कुहर=गुहा ।)
पूर्व श्लोक की संगति से इस श्लोक का भाव स्पष्ट है कि मूलाधार से जागकर सुषुम्ना मार्ग द्वारा जब कुँडलिनी हृदयस्थ सूर्य को उन्मुख करती हुई आज्ञा चक्र के ऊपर चन्द्रमंडल में प्रवेश करती है, तब उसके चरणद्वय के बीच से अमृत की धारायें नीचे बरसने लगती हैं। यहां भगवती के चरणों का ध्यान आज्ञा चक्र में किया जाना बताया गया है ।
शक्ति के अवतरण के साथ सब नाडियों का भिन्न-भिन्न चक्रों के द्वारा अमृत के प्रवाह से सारे शरीर में आनखशिख सिंचाव होता है । जिस मार्ग से शक्ति का आरोहण होता है उसी मार्ग से