सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ सौन्दर्य लहरी
लंबी भुजाओं वाला समचतुष्कोण लो, उसके बीचोंबीच में एक खडी रेखा खेंचो, जो चतुष्कोण को दो सम भागों में विभक्त करती हो। उस रेखा के प्रति इंच के १२ विभाग के अनुपात से ९६ सम विभाग करलो। इस चतुष्कोण के भीतर एक एक विभाग छोडकर दो वैसे ही सम चतुष्कोण और बनाओ, इन तीन चतुष्कोणों का भूगृह नामक त्रैलोक्य मोहन चक्र कहलाता है। चारों दिशाओं में मध्य में एक एक द्वार खोल देना चाहिये। अब उस मध्यवर्ती खडी रेखा के मध्य विन्दु को केन्द्र मानकर ४५, ४४ ३/८, ४४, ३५ और २४ विभागों के बराबर अर्धव्यास मानकर पांच वलयाकार वृत्त ( circles ) खेंचो। सब से अन्दर के वृत्त पर अष्ट दल पद्म और उसके ऊपर वाले वृत्त पर षोडषदल पद्म बनाओ। बीच के शेष वर्तुलाकार क्षेत्र में ५ उर्ध्व त्रिकोण और ४ अधस्त्रिकोण बनाने से पूरा श्री चक्र बन जाता है। इन ९ त्रिकोणों का निर्माण इस प्रकार किया जाता है। मध्य रेखा पर ऊपर से नीचे की ओर ६, ६, ६, ३, ४, ३, ३, ५, और ६ विभागों के अन्तर पर ९ चिन्ह बनालो। जिनको हम यहां पर कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै, से नामांकित करते हैं। इन चिन्हों पर ऊर्ध्व रेखा पर सम कोण बनाने वाली और अन्तर्वृत्त ( innermost circle ) के १० खंड करने वाली कोटि रेखायें ( chordlines ) खैंचो। उन के नाम भी क्रमशः कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै वाली रेखाएं समझना चाहिये। फिर उन रेखाओं के दोनों सिरों पर से नीचेबताए हिसाब से दोनों ओर सम भाग मिटा दो। कै और पै रेखाओं का ५/१६ भाग दोनों सिरों पर अर्थात पूरी रेखा