सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 17, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ श्री शिवः शरणम्
आमुख ।
परमगुरु श्री गौडपादाचार्य महाराज का सम्मत अजातवाद तथा भगवत्पाद श्री आद्य शंकराचार्य महाराज का सम्मत विवर्तवाद दोनों को पर्यायभूत सिद्धांत समझना, सामान्य जनता की बुद्धि को अगम्य है, इस लिए भगवत् पूज्यपाद महाराज ने उपासनादि द्वारा जनता की बुद्धि को विशद करने के लिए 'हरिमीडे' इत्यादि तत्तद्देवता के स्तोत्र बनाए। इन्हीं उत्तमोत्तम स्तोत्रों की पंक्ति में अग्रणीपद इस सौन्दर्य-लहरी को ही प्राप्त है। दृश्यमान जगत् की सत्यता जिनको प्रतीत होती है ऐसी जनता के सद्बोध के लिए अध्यारोपापवाद न्याय से अध्यारोप—समय में विवर्तवादी भगवत् पूज्यपाद को परिणामवाद मानना क्रमप्राप्त होने से सुसंगत ही है। इसी अध्यारोप दृष्टि से सौन्दर्य लहरी में सर्व जगत पूज्य भगवती की प्रार्थना की गई है जिस से भगवती का प्रसाद मिलेगा, तदनन्तर केनोपनिषद वर्णित प्रकार से उपासक को सत्यज्ञान लाभ होगा; अर्थात यह विवर्तवाद का ही परिणित स्वरूप है। विमर्शशाली विद्वानों को यह भलीभांति विदित है कि जगतगुरु के प्रादुर्भाव के समय में कादि, हादि उपासना तथा योगमार्ग तत्र तत्र प्रचलित थे, उसी को लेकर भगवती की महाराज ने प्रार्थना की है। यह क्रम उपनिषद सम्मत है क्यों कि छांदोग्यादि उपनिषदों में कर्मठों की सम्मत उद्गीथादि उपासना कही गई हैं। स्पष्टार्थ से केवल भगवती के अंगप्रत्यंगों का वर्णन सौन्दर्य लहरी से प्रतीत होता है परन्तु अभियुक्त टीकाकारों ने तंत्रशास्त्र तथा