सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १३५
होता। इसलिये इन श्लोकों को एक ज्ञानी अथवा योगी के हृदय में वैराग्य उत्पन्न करने के निमित्त ही लिखा जाना समझना चाहिये। परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री शंकर भगवत्पाद की लेखिनी से निकले हुए श्लोकों का अभिप्राय किसी सांसारिक काम वासना से संतप्त मनुष्य की स्त्री लोलुपता की सहायतार्थ काम प्रयोगों के लिये लिखा जाना सर्वथा असंभव है। और उनमें काम सिद्धि के तुच्छ प्रयोगों का विनियोग देखना अथवा करना भगवत्पाद की महानता पर कलंक लगाना मात्र है।
<u>शक्तिपात् करने की सिद्धि</u>
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किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरुम्बामृतरसं हृदित्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः । स सर्पाणांदर्प शमयति शकुन्ताधिप इव ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥
कठिन शब्दः- किरन्ती=किरणें फैलाती हुई (radiating)
निकुरम्ब=समूह, हिमकर=चन्द्र, शकुन्ताधिप=गरुड, सिरा=नाडी ।
सुधाधार सिरा=अमृत नाडी, जिससे अमृत का स्राव होता है ।
अर्थः- जो मनुष्य अंगों से अमृत रस रूपी किरणों के समूह का निकास करती हुई तुझ को हृदय में धारण करता है, और तेरा चन्द्रकान्त शिला की मूर्तीवत हृदय में ध्यान करता है,