सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १४१
और स्वप्न की नाडियों का स्थान है, इसी को मनश्चक्र भी कहते हैं । इसके ऊपर एक अति सूक्ष्म नलिका है जो सुषुम्ना के मध्यवर्ती विल का वह भाग है जो छोटे दिमाग अर्थात् कपाल कंद को सहस्रार ( cerebrum ) के मध्यवर्ती ब्रह्मरंध्र ( Third Ventrical ) से जोडता है । इस भाग के नीचे कपाल कंद के सामने भी एक त्रिकोणाकृति कपाल रंध्र (Fourth ventrical) है । (Third Ventrical ) ब्रह्म रंध्र भी त्रिकोणा कृति ही है जो पीछे से सामने की ओर फैला हुआ है । ब्रह्मरंध्र पर एक पुलसा बना हुआ है, जिस पर सुषुम्ना पथ से आने वाले स्नायु समूह स्पर्श कर के फिर सारे मस्तिष्क (cerebrum) के विभिन्न केन्द्रों को फैल जाते हैं । इसलिये इस स्नायु समूह के प्रसार को सहस्रार कहते है ।
गुदा के पीछे एक मांस पेशी है, जिसे कंद कहते हैं । वह ९ अंगुल लंबी और ४ अंगुल मोटी कही जाती है । इसके मध्यवर्ती नाभिवत् केन्द्र पर कुण्डलिनी के सोने का स्थान है । उस स्थान को विषु चक्र भी कहते हैं, क्योंकि यहां शक्ति निष्क्रिय सुप्तवत् रहती है, अथवा वह ईडा और पिंगला का एक स्थानीय उद्गम स्थान होने के कारण, वहां चन्द्रमा और सूर्य दोनों का अभाव सा रहता है अर्थात् दिन रात्रि एक समान गति रहित रहते हैं । विषु दिन रात्रि के एक समान होने के समय को कहते हैं । कुण्डलिनी को नाभि में धारण करने वाली मांस पेशी का कंद अधः सहस्रार कहलाता है । क्योंकि योगियों के समष्टि प्राण देह की सब नाडियों से खिंचकर पहिले यहां एकत्रित होते हैं और फिर सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं ।