सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १४२
**अर्थ:—**उसके मध्य अग्नि की शिखा, पतली ऊपर को उठी हुई खड़ी है। जो नीले मेघों में विद्युत् रेखा के सदृश चमकती है, वह नीवारशूक के सदृश पतली, पीत वर्णा, अणु के सदृश चमकती है। उसकी शिखा के मध्य में परमात्मा विराजता है, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि, इन्द्र और परम स्वराट् अक्षर ब्रह्म है।
इसी को सदाख्य कला समझना चाहिये। सदाख्य तत्व की १६ कलायें नीचे दी जाती हैं। निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इन्धिका, दीपिका, रेचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञाना, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी और व्योमरूपा।
सब कलाओं का योग ८८ होता है, इनमें मूलाधारस्थ पृथिवी की ४, जल की छः और आज्ञाचक्र की ईडा, पिंगला अथवा सहस्रार की ओर बहनेवाली वरणा और असी दो कलायें मिलाने से सब की संख्या पूरी १०० होती है। ये सब भगवती कुण्डलिनी देवी की ही कलायें हैं। मूलाधार से उठकर सारे कुलपथ में उक्त कलाओं के विविध रूपों में प्रकाशित होती हुई, कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार में अपने पति शिवजी से मिलने जब जाती है तब मानों अनेक श्रृंगारों को धारण करती है।
मूलाधार से नीचे विषु संज्ञक और अधः सहस्रार दो चक्र और
| आज्ञा के ऊपर<br>९ स्तर | भी माने जाते हैं और आज्ञा के ऊपर बिन्दु अर्धेन्दु अथवा अर्धचन्द्रिका, निरोधिका, नाद, महानाद अथवा नादान्त, शक्ति, व्यापिका, |
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